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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 8 • Mantra 18

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 8 • मन्त्र 18

10.8.18

Mantra ID: 10.8.18

स॑हस्रा॒ह्ण्यं विय॑तावस्य प॒क्षौ हरे॑र्हं॒सस्य॒ पत॑तः स्व॒र्गम् । स दे॒वान्त्सर्वा॒नुर॑स्युप॒दद्य॑ सं॒पश्य॑न्याति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥ (१८)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.8.18 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

पाप का विनाश करने वाला यह हंस जब स्वर्ग की ओर गमन करता है तो इस के दोनों पंख हजार दिनों तक फैले रहते हैं. यह सभी देवों को अपनी छाती पर बैठा कर सारे संसार को देखता हुआ जाता है. (१८)

EN English Translation

When this swan, which destroys sin, goes to heaven, both its wings are spread for a thousand days. He sits all the gods on his chest and looks at the whole world. (18)

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