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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 2 • Mantra 33

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 2 • मन्त्र 33

12.2.33

Mantra ID: 12.2.33

यो नो॑ अ॒ग्निः पि॑तरो हृ॒त्स्वन्तरा॑वि॒वेशा॒मृतो॒ मर्त्ये॑षु । मय्य॒हं तं॒ परि॑ गृह्णामि दे॒वं मा सो अ॒स्मान्द्वि॑क्षत॒ मा व॒यं तम् ॥ (३३)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.2.33 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे पितरो! नष्ट न होने वाले फल को देने वाले अग्नि हमारे हृदय में विराजमान हैं. वे हम सब से द्वेष करने वाले न हों. हम भी उन के प्रति द्वेष न करें. (३३)

EN English Translation

O father! The agni that gives the fruit that is not destroyed is sitting in our hearts. They should not be haters of all of us. Let us also not hate them. (33)

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