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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 3 • Mantra 25

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 3 • मन्त्र 25

12.3.25

Mantra ID: 12.3.25

पू॒ताः प॒वित्रैः॑ पवन्ते अ॒भ्राद्दिवं॑ च॒ यन्ति॑ पृथि॒वीं च॑ लो॒कान् । ता जी॑व॒ला जी॒वध॑न्याः प्रति॒ष्ठाः पात्र॒ आसि॑क्ताः॒ पर्य॒ग्निरि॑न्धाम् ॥ (२५)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.3.25 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

पुण्य कर्मो द्वारा शुद्ध हुए जल तुझे शुद्ध करने वाले हों. वे मेघों द्वारा आकाश में जाते और फिर पृथ्वी पर आ कर मनुष्यों की सेवा करते हैं. जल पृथ्वी से पुनः अंतरिक्ष में पहुंचते हैं तथा प्राणियों को सुखी करने वाले पात्र में स्थित होते हैं. अग्नि इन आसक्त होने वाले जलों को सभी ओर दीप्त करें. (२५)

EN English Translation

May the water purified by virtuous deeds purify you. They go to the sky through clouds and then come to earth and serve humans. Water reaches space again from earth and is located in the vessel that makes the creatures happy. Light up these attached waters on all sides. (25)

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