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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 3 • Mantra 42

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 3 • मन्त्र 42

12.3.42

Mantra ID: 12.3.42

नि॒धिं नि॑धि॒पा अ॒भ्येनमिच्छा॒दनी॑श्वरा अ॒भितः॑ सन्तु॒ ये॒न्ये । अ॒स्माभि॑र्द॒त्तो निहि॑तः स्व॒र्गस्त्रि॒भिः काण्डै॒स्त्रीन्त्स्व॒र्गान॑रुक्षत् ॥ (४२)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.3.42 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यजमान को इस निधि की कामना करनी चाहिए. हमारे द्वारा दिया हुआ भात धरोहर के रूप में है. यह ओदन स्वर्गगामी होता हुआ अपने तीनों कांडों सहित स्वर्ग में पहुंचे. (४२)

EN English Translation

The host should wish for this fund. The rice given by us is in the form of heritage. This odan went to heaven and reached heaven with all three of his kandas. (42)

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