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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 1 • Mantra 31

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 1 • मन्त्र 31

13.1.31

Mantra ID: 13.1.31

अग्ने॑ स॒पत्ना॒नध॑रान्पादया॒स्मद्व्य॒थया॑ सजा॒तमु॒त्पिपा॑नं बृहस्पते । इन्द्रा॑ग्नी॒ मित्रा॑वरुणा॒वध॑रे पद्यन्ता॒मप्र॑तिमन्यूयमानाः ॥ (३१)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.1.31 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! तुम हमारे शत्रुओं को पतित बनाओ. हे बृहस्पति! तुम उन्नतिशील होते हुए हमारे शत्रुओं का संतप्त करो. इंद्र, अग्नि, मित्र और वरुण देवता हमारे शत्रुओं का विरोध करें. हमारे शत्रु पतित हो जाएं. (३१)

EN English Translation

O agni! You make our enemies impure. O Jupiter! You should prosper and satisfy our enemies. May Indra, Agni, Mitra and Varuna Devta oppose our enemies. Let our enemies degenerate. (31)

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