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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 3 • Mantra 14

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 3 • मन्त्र 14

13.3.14

Mantra ID: 13.3.14

स॑हस्रा॒ह्ण्यं विय॑तावस्य प॒क्षौ हरे॑र्हं॒सस्य॒ पत॑तः स्व॒र्गम् । स दे॒वान्त्सर्वा॒नुर॑स्युप॒दद्य॑ सं॒पश्य॑न्याति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (१४)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.3.14 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इन पापनाशक और स्वर्गगामी सूर्य से दोनों अयन अर्थात्‌ उत्तरायण और दक्षिणायन सहस्रों दिवसों में नियमपूर्वक बंधे रहते हैं. ये सब देवताओं को अपने में लीन कर के सभी जीवों को देखते हुए चलते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों के बंधन में डालो. (१४)

EN English Translation

Both uttarayan and dakshinayan are bound by these sinful and heavenly suns in thousands of days. All of them keep the gods in them and walk while looking at all the creatures. O Rohit Dev, the criminal of such an angry God and the violent of a learned Brahmin! Make you tremble and weaken and put it in the bondage of your loops. (14)

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