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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 3 • Mantra 15

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 3 • मन्त्र 15

13.3.15

Mantra ID: 13.3.15

अ॒यं स दे॒वो अ॒प्स्वन्तः स॒हस्र॑मूलः पुरु॒शाको॒ अत्त्रिः॑ । य इ॒दं विश्वं॒ भुव॑नं॒ जजा॑न । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (१५)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.3.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सभी लोकों को जिन्होंने प्रकाशित किया वे देव जल में वास करते हैं. वे ही सहस्रो के मूल रूप तथा तीनों तापों अर्थात्‌ दैहिक, दैविक भौतिक से रहित अग्नि हैं. इस क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों में बांध लो. (१५)

EN English Translation

Those who illuminate all the worlds, they live in god water. They are the basic form of Sahasro and the agni devoid of all three heats i.e. physical, divine physical. O Rohit Dev, the criminal of this angry God and the violent of the learned Brahmin! Make you staggered attenuated and tie in your loops. (15)

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