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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 2 • Mantra 53

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 2 • मन्त्र 53

18.2.53

Mantra ID: 18.2.53

अग्नी॑षोमा॒पथि॑कृता स्यो॒नं दे॒वेभ्यो॒ रत्नं॑ दधथु॒र्वि लो॒कम् । उप॒ प्रेष्य॑न्तंपू॒षणं॒ यो वहा॑त्यञ्जो॒यानैः॑ प॒थिभि॒स्तत्र॑ गच्छतम् ॥ (५३)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.2.53 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि एवं सोम! तुम पुण्यलोक के मार्ग का निर्माण करते हो. तुम ने सुख देने वाले स्वर्गलोक की रचना की है. जो लोक सूर्य को अपने में धारण करता है, इस प्रेत को सरल मार्गों द्वारा उस लोक में पहुंचाओ. (५३)

EN English Translation

O Agni and Soma! You build the path of virtue. You have created the land of heaven that gives happiness. The people who hold the sun in themselves, bring this ghost to that world through simple ways. (53)

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