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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 3 • Mantra 20

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 3 • मन्त्र 20

18.3.20

Mantra ID: 18.3.20

ये अत्र॑यो॒अङ्गि॑रसो॒ नव॑ग्वा इ॒ष्टाव॑न्तो राति॒षाचो॒ दधा॑नाः । दक्षि॑णावन्तः सु॒कृतो॒ यउ॒ स्थासद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयध्वम् ॥ (२०)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.3.20 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे पितरो! तुम अत्रि और अंगिरा गोत्र वाले हो. तुम नौ महीने तक सत्र याग करने के कारण स्वर्ग में आरोहण करने वाले होता हो. तुम दस मास वाला याग पूर्ण करने पर दक्षिणा देने वाले पुण्य आत्मा हो. इस कारण इस विस्तृत कुश पर बैठ कर हमारी हवि से तृप्ति करो. (२०)

EN English Translation

O father! You belong to the tribe of Atri and Angira. You are about to climb to heaven because of the session yag for nine months. You are a virtuous soul who gives dakshina after completing the ten-month yag. For this reason, sit on this wide kush and satisfy our desire. (20)

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