Popular:
अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 4 • Mantra 16

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 4 • मन्त्र 16

18.4.16

Mantra ID: 18.4.16

अ॑पू॒पवा॑न्क्षी॒रवां॑श्च॒रुरेह सी॑दतु । लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ येदे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥ (१६)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 18.4.16 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

पिसे हुए गेहूं में दूध मिला कर तैयार किया हुआ ओदन रूप चरु इस कर्म में अस्थियों के समीप पश्चिम दिशा में रखा रहे. इस संस्कार को प्राप्त हुए प्रेत के लिए स्वर्ग के निर्माता इंद्र आदि देवों में से इस हवि के अधिकारी यहां वर्तमान देवों को मैं प्रसन्न करता हूं. (१६)

EN English Translation

Odan Roop Charu prepared by mixing milk in ground wheat should be kept in the west direction near the bones in this karma. For the ghost received by this sacrament, I please the present gods here, the creator of heaven, Indra etc. (16)

卐 HinduText AI