Popular:
अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 4 • Mantra 22

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 4 • मन्त्र 22

18.4.22

Mantra ID: 18.4.22

अ॑पू॒पवा॒न्मधु॑मांश्च॒रुरेह सी॑दतु । लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ येदे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥ (२२)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 18.4.22 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

पिसे हुए गेहूं के पूओं से युक्त और शहद मिले हुए कुंभी पक्व भात रूप चरु इस कार्य में अस्थियों के पश्चिम भाग में रखा रहे. जिस का संस्कार किया जा रहा है उस प्रेत के लिए स्वर्ग का निर्माण करने वाले इंद्र आदि देवताओं में से इस हवि के अधिकारी जो देवता यहां विद्यमान हैं, हम उन का स्वागत करते हैं. (२२)

EN English Translation

Anghabi pakva bhaat roop charu containing ground wheat beans and mixed with honey should be kept in the western part of the bones in this work. We welcome the deities who are present here from indra etc. who have created heaven for the ghost who is being cremated. (22)

卐 HinduText AI