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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 4 • Mantra 32

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 4 • मन्त्र 32

18.4.32

Mantra ID: 18.4.32

धा॒नाधे॒नुर॑भवद्व॒त्सो अ॑स्यास्ति॒लोऽभ॑वत् । तां वै य॒मस्य॒ राज्ये॒ अक्षि॑ता॒मुप॑जीवति ॥ (३२)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.4.32 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे प्रेत! मंत्रों के अनुसार दिए गए धान यमलोक में जा कर तृप्त करने वाली गाय बनते हैं और तिल उस धन रूपी गाय का बछड़ा बनता है. प्रेत यम के राज्य में उन धानों से बनी हुई गाय पर ही आश्रित होता हुआ जीवित रहता है. (३२)

EN English Translation

O ghost! According to the mantras, the paddy given goes to Yamlok and becomes the satiating cow and the mole becomes the calf of that money cow. In the kingdom of Pret Yama, he survives depending on the cow made from those paddy. (32)

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