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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 4 • Mantra 46

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 4 • मन्त्र 46

18.4.46

Mantra ID: 18.4.46

सर॑स्वतींपि॒तरो॑ हवन्ते दक्षि॒णा य॒ज्ञम॑भि॒नक्ष॑माणाः । आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑मादयध्वमनमी॒वा इष॒ आ धे॑ह्य॒स्मे ॥ (४६)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.4.46 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

वेदी के दक्षिण भाग में बैठे हुए पितर भी सरस्वती का आह्वान करते हैं. हे पितरो! तुम इस यज्ञ में प्रसन्नता प्राप्त करो. हे सरस्वती! तुम पितरों के द्वारा बुलाए जाने पर हमें मन चाहे अन्न से प्रतिष्ठित करो. (४६)

EN English Translation

The pitars sitting in the southern part of the altar also invoke Saraswati. O father! May you find happiness in this yajna. O Saraswati! When you are called by your fathers, honor us with the food you want. (46)

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