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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 4 • Mantra 45

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 4 • मन्त्र 45

18.4.45

Mantra ID: 18.4.45

सर॑स्वतींदेव॒यन्तो॑ हवन्ते॒ सर॑स्वतीमध्व॒रे ता॒यमा॑ने । सर॑स्वतीं सु॒कृतो॑ हवन्ते॒सर॑स्वती दा॒शुषे॒ वार्यं॑ दात् ॥ (४५)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.4.45 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मृतक का दाह संस्कार करने वाले पुरुष अग्नि की इच्छा करते हुए सरस्वती का आह्वान करते हैं. ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों के अवसर पर भी सरस्वती का आह्वान किया जाता है. वे सरस्वती हवि देने वाले यजमान को वरण करने योग्य पदार्थ प्रदान करें. (४५)

EN English Translation

The men who cremate the deceased invoke Saraswati, wishing for agni. Saraswati is also invoked on the occasion of jyotishtom etc. yajnas. They should provide suitable substances to the host who gives Saraswati Havi. (45)

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