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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 128 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 128 • मन्त्र 2

20.128.2

Mantra ID: 20.128.2

यो जा॒म्या अप्र॑थय॒स्तद्यत्सखा॑यं॒ दुधू॑र्षति । ज्येष्ठो॒ यद॑प्रचेता॒स्तदा॑हु॒रध॑रा॒गिति॑ ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.128.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जाम्य ने जिसे विस्तृत किया, वह मित्र को सुशोभित करता है. जो ज्येष्ठ प्रचेता है, उसे लोग अधराक्‌ कहते हैं. (२)

EN English Translation

What Jamya elaborates adorns the friend. The one who is the eldest pracheta is called a half-hearted. (2)

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