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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 25 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 25 • मन्त्र 5

20.25.5

Mantra ID: 20.25.5

य॒ज्ञैरथ॑र्वा प्रथ॒मः प॒थस्त॑ते॒ ततः॒ सूर्यो॑ व्रत॒पा वे॒न आज॑नि । आ गा आ॑जदु॒शना॑ का॒व्यः सचा॑ य॒मस्य॑ जा॒तम॒मृतं॑ यजामहे ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.25.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इंद्र के लिए यज्ञ करने वाले अथर्वा ऋषि ने पणियों द्वारा चुराई हुई गायों को छिपा कर रखने के स्थान का मार्ग पहले ही जान लिया था. जब सूर्योदय हो गया, तब कवि के पुत्र उशना ने इंद्र की सहायता से उन गायों को प्राप्त किया था. हम अविनाशी इंद्र का पूजन करते हैं. (५)

EN English Translation

Atharva Rishi, who performed the yagna for Indra, had already known the route to the place of hiding the cows stolen by the panis. When the sunrise happened, the poet's son Ushna had received those cows with the help of Indra. We worship the imperishable Indra. (5)

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