Popular:
ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 170 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 170 • ऋचा / मन्त्र 3

1.170.3

Mantra ID: 1.170.3

किं नो॑ भ्रातरगस्त्य॒ सखा॒ सन्नति॑ मन्यसे । वि॒द्मा हि ते॒ यथा॒ मनो॒ऽस्मभ्य॒मिन्न दि॑त्ससि ॥ (३)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 1.170.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इंद्र बोले-“हे भाई अगस्त्य! तुम मित्र होकर हमारा अपमान क्यों कर रहे हो? तुम्हारे मन में जो बात है, उसे हम जानते हैं. तुम हमें हव्य देना नहीं चाहते हो.” (३)

EN English Translation

Indra said, "Brother, Agastya! Why are you insulting us by being a friend? We know what's on your mind. You don't want to give us a hug." (3)

卐 HinduText AI