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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 170 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 170 • ऋचा / मन्त्र 4

1.170.4

Mantra ID: 1.170.4

अरं॑ कृण्वन्तु॒ वेदिं॒ सम॒ग्निमि॑न्धतां पु॒रः । तत्रा॒मृत॑स्य॒ चेत॑नं य॒ज्ञं ते॑ तनवावहै ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.170.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे ऋत्विजो! तुम वेदी को अलंकृत करो एवं हमारे सामने अग्नि को जलाओ. हम और तुम उस अग्नि में अमृत की सूचना देने वाला यह करेंगे.” (४)

EN English Translation

Hey Ritvijo! You adorn the altar and light the fire before us. We and you will do this to inform the nectar in that fire." (4)

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