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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 28 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 28 • ऋचा / मन्त्र 5

2.28.5

Mantra ID: 2.28.5

वि मच्छ्र॑थाय रश॒नामि॒वाग॑ ऋ॒ध्याम॑ ते वरुण॒ खामृ॒तस्य॑ । मा तन्तु॑श्छेदि॒ वय॑तो॒ धियं॑ मे॒ मा मात्रा॑ शार्य॒पसः॑ पु॒र ऋ॒तोः ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.28.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे वरुण! पाप ने मुझे रस्सी के समान बांध लिया है. मुझे इससे छुड़ाओ. हम तुम्हारी जलपूर्ण नदी को प्राप्त करें. यज्ञकर्म करते समय मेरा कार्य रुके नहीं. यज्ञ समाप्ति से पहले मेरा शरीर कभी शिथिल न हो. (५)

EN English Translation

Hey Varun! Sin has tied me up like a rope. Get me out of it. Let's get to your watery river. My work did not stop while doing yajnakarma. Never let my body relax before the end of the yajna. (5)

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