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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 35 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 35 • ऋचा / मन्त्र 1

2.35.1

Mantra ID: 2.35.1

उपे॑मसृक्षि वाज॒युर्व॑च॒स्यां चनो॑ दधीत ना॒द्यो गिरो॑ मे । अ॒पां नपा॑दाशु॒हेमा॑ कु॒वित्स सु॒पेश॑सस्करति॒ जोषि॑ष॒द्धि ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.35.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं अन्न का अभिलाषी बनकर यह स्तुति बोल रहा हूं. शब्दकारी स्तुति पसंद करने वाले एवं शीघ्रगतिशील जल के नाती अर्थात्‌ अग्नि मुझ स्तोता को अधिक अन्न एवं उत्तम रूप प्रदान करें. (१)

EN English Translation

I am speaking this praise by becoming a desire for food. May the grandson of the fast-paced water, i.e., the agni, give me more food and a better look to me. (1)

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