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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 41 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 41 • ऋचा / मन्त्र 5

2.41.5

Mantra ID: 2.41.5

राजा॑ना॒वन॑भिद्रुहा ध्रु॒वे सद॑स्युत्त॒मे । स॒हस्र॑स्थूण आसाते ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.41.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

शत्रुरहित एवं दीप्तिमान्‌ मित्र व वरुण! ध्रुव, ऊंचे और हजार खंभों वाले इस स्थान में बैठो. (५)

EN English Translation

Without enemies and bright friends and Varuna! Sit in this place with poles, high and thousand pillars. (5)

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