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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 37 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 37 • ऋचा / मन्त्र 2

5.37.2

Mantra ID: 5.37.2

समि॑द्धाग्निर्वनवत्स्ती॒र्णब॑र्हिर्यु॒क्तग्रा॑वा सु॒तसो॑मो जराते । ग्रावा॑णो॒ यस्ये॑षि॒रं वद॒न्त्यय॑दध्व॒र्युर्ह॒विषाव॒ सिन्धु॑म् ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.37.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अन्नि प्रज्वलित करने वाला, कुश बिछाने वाला एवं हाथ में पत्थर उठाकर सोम निचोड़ने वाला यजमान ध्यानपूर्वक स्तुति करता है. जिस अध्वर्यु का पत्थर मधुर शब्द करता है, वह हव्य के साथ नदी में स्नान करता है. (२)

EN English Translation

The host, who ignites the anni, lays the kush and squeezes the mon with a stone in his hand, praises carefully. The adhwaryu, whose stone makes the sweet word, bathes in the river with a havya. (2)

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