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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 47 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 47 • ऋचा / मन्त्र 3

5.47.3

Mantra ID: 5.47.3

उ॒क्षा स॑मु॒द्रो अ॑रु॒षः सु॑प॒र्णः पूर्व॑स्य॒ योनिं॑ पि॒तुरा वि॑वेश । मध्ये॑ दि॒वो निहि॑तः॒ पृश्नि॒रश्मा॒ वि च॑क्रमे॒ रज॑सस्पा॒त्यन्तौ॑ ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.47.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले, देवों को प्रमुदित करने वाले, दीप्तिशाली व शोभन- गतियुक्त रथ ने अंतरिक्ष की पूर्व दिशा में प्रवेश किया था. इसके बाद स्वर्ग के बीच में छिपे हुए, विविध रंगों वाले एवं सर्वव्यापक सूर्य आकाश के पूर्व और पश्चिम भाग में विचरण करके रक्षा करते रहें. (३)

EN English Translation

The chariot, which fulfilled the desires, adored the gods, had entered the eastern direction of space. After this, the hidden, diverse-colored and ubiquitous sun hidden in the middle of heaven, move around the east and west of the sky and protect it. (3)

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