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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 47 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 47 • ऋचा / मन्त्र 4

5.47.4

Mantra ID: 5.47.4

च॒त्वार॑ ईं बिभ्रति क्षेम॒यन्तो॒ दश॒ गर्भं॑ च॒रसे॑ धापयन्ते । त्रि॒धात॑वः पर॒मा अ॑स्य॒ गावो॑ दि॒वश्च॑रन्ति॒ परि॑ स॒द्यो अन्ता॑न् ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.47.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अपने कल्याण की अभिलाषा वाले चार ऋत्विज्‌ स्तुतियों एवं हव्य द्वारा सूर्य को धारण करते हैं. दश-दिशाएं सूर्य को चलने के लिए प्रेरित करती हैं. सूर्य की तीन प्रकार की किरणें उत्तमतापूर्वक आकाश के अंत तक शीघ्रतापूर्वक गमन करती हैं. (४)

EN English Translation

The four ritwijs who desire their welfare hold the sun through hymns and havans. The dashing directions motivate the sun to move. The three types of sun's rays move quickly to the end of the sky. (4)

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