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ऋग्वेद

Mandal 6 • Sukta 48 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 6 • सूक्त 48 • ऋचा / मन्त्र 5

6.48.5

Mantra ID: 6.48.5

यमापो॒ अद्र॑यो॒ वना॒ गर्भ॑मृ॒तस्य॒ पिप्र॑ति । सह॑सा॒ यो म॑थि॒तो जाय॑ते॒ नृभिः॑ पृथि॒व्या अधि॒ सान॑वि ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 6.48.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे यज्ञ के गर्भ अग्नि! जल, पत्थर एवं अरणि रूप काष्ठ तुम्हें शक्तिशाली बनाते हैं. तुम मनुष्यों द्वारा बलपूर्वक मथे जाते हो एवं धरती के उच्च स्थान में प्रकट होते हो. (५)

EN English Translation

O garbha agni of yajna! Wood in the form of water, stone and agniwood make you powerful. You are forced by men and appear in the higher place of the earth. (5)

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