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ऋग्वेद

Mandal 7 • Sukta 59 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 7 • सूक्त 59 • ऋचा / मन्त्र 2

7.59.2

Mantra ID: 7.59.2

यु॒ष्माकं॑ देवा॒ अव॒साह॑नि प्रि॒य ई॑जा॒नस्त॑रति॒ द्विषः॑ । प्र स क्षयं॑ तिरते॒ वि म॒हीरिषो॒ यो वो॒ वरा॑य॒ दाश॑ति ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 7.59.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे देवो! तुम्हारे द्वारा रक्षित प्रियदिन में जो यज्ञ करता है, जो शत्रुओं पर आक्रमण करता है, जो अपने निवासस्थान को बढ़ाता है, वह तुम्हें अधिक हव्य इसलिए देता है कि तुम्हें दूसरी जगह जाने से रोक सके. (२)

EN English Translation

Oh, God! The one who performs the yajna in the beloved day you have protected, which attacks the enemies, who increases his dwelling place, gives you more pleasure in order to prevent you from going to another place. (2)

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