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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 49 • Mantra / Rik 14

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 49 • ऋचा / मन्त्र 14

8.49.14

Mantra ID: 8.49.14

न॒हि ते॑ अग्ने वृषभ प्रति॒धृषे॒ जम्भा॑सो॒ यद्वि॒तिष्ठ॑से । स त्वं नो॑ होतः॒ सुहु॑तं ह॒विष्कृ॑धि॒ वंस्वा॑ नो॒ वार्या॑ पु॒रु ॥ (१४)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.49.14 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अभिलाषापूरक अग्नि! तुम्हारे दांतों के समान ज्वालाओं को कोई रोक नहीं सकता, इसलिए तुम बढ़ते हो. हे होता अग्नि! तुम हमारे हव्य का भली प्रकार हवन करो एवं हमें वरण करने योग्य धन अधिक मात्रा में दो. (१४)

EN English Translation

This is the agni! No one can stop the flames like your teeth, so you grow. It was agni! You should perform havan of our desire and give us more money to choose. (14)

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