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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 63 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 63 • ऋचा / मन्त्र 1

8.63.1

Mantra ID: 8.63.1

वि॒शोवि॑शो वो॒ अति॑थिं वाज॒यन्तः॑ पुरुप्रि॒यम् । अ॒ग्निं वो॒ दुर्यं॒ वचः॑ स्तु॒षे शू॒षस्य॒ मन्म॑भिः ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.63.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अन्नाभिलाषी ऋत्विजो एवं यजमानो! तुम सारी प्रजा के अतिथि एवं बहुतों के प्रिय अग्नि की सेवा स्तुति द्वारा करो. मैं तुम्हारी सुखप्राप्ति के लिए सुंदर स्तुतियों द्वारा गूढ़वचन बोलता हूं. (१)

EN English Translation

O annibhilashi ritvizo and hosts! Serve the agni, the guests of all the people and the beloved of many, by praise. I speak the deepest word through beautiful praises for your happiness. (1)

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