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सामवेद

Chapter / Prapathak 17 • Dashati / Sukta 2 • Mantra 5

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 17 • दशती / सूक्त 2 • मन्त्र 5

17.2.5

Mantra ID: 17.2.5

अवक्रक्षिणं वृषभं यथा जुवं गां न चर्षणीसहम् । विद्वेषणँ संवननमुभयङ्करं मँहिष्ठमुभयाविनम् ॥ (५)

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सामवेद मन्त्र 17.2.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इंद्र महान हैं. वे भौतिक और पारलौकिक दोनों वैभव देने वाले, यजमानों के आराध्य देव, शत्रुओं से द्वेष रखने वाले, शत्रुओं के नाशक, शीघ्र जाने वाले और बैल की तरह बलपूर्वक संघर्ष करने वाले हैं. आप उन्हीं इंद्र की स्तुति कीजिए. (५)

EN English Translation

Indra is great. He is the god of both material and transcendental splendour, the adorable god of hosts, the hater of enemies, the destroyer of enemies, the quick-going and the one who fights forcefully like an oxen. You praise the same Indra. (5)

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