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सामवेद

Chapter / Prapathak 3 • Dashati / Sukta 12 • Mantra 1

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 3 • दशती / सूक्त 12 • मन्त्र 1

3.12.1

Mantra ID: 3.12.1

गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः । ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वँशमिव येमिरे ॥ (१)

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सामवेद मन्त्र 3.12.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! आप सैकड़ों कर्म करने वाले हैं. गाने वाले आप के गुण गाते हैं. मंत्रों से आप का आह्वान करते हैं. ब्रह्मा नामक ऋत्विक्‌ वैसे ही स्वर साध कर आप की उपासना करते हैं, जैसे बांस के ऊपर नट अपनेआप को साधते हैं. (१)

EN English Translation

O Indra! You are going to do hundreds of deeds. The singers sing your qualities. Invoke you with mantras. A ritvik named Brahma worships you by maintaining the same tone, just as the nuts on the bamboo themselves. (1)

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