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ऋग्वेद

Mandal 2 • Sukta 38 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 2 • सूक्त 38 • ऋचा / मन्त्र 4

2.38.4

Mantra ID: 2.38.4

पुनः॒ सम॑व्य॒द्वित॑तं॒ वय॑न्ती म॒ध्या कर्तो॒र्न्य॑धा॒च्छक्म॒ धीरः॑ । उत्सं॒हाया॑स्था॒द्व्यृ१॒॑तूँर॑दर्धर॒रम॑तिः सवि॒ता दे॒व आगा॑त् ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 2.38.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

कड़े बुनने वाली नारी जिस प्रकार कपड़ा लपेटती है, उसी प्रकार रात बिखरे हुए प्रकाश को समेट लेती है. कार्य करने में समर्थ एवं बुद्धिमान्‌ लोग अपना काम बीच में ही रोक देते हैं. विरामरहित एवं समय का विभाग करने वाले सविता देव के उदित होने पर लोग शय्या छोड़ते हैं. (४)

EN English Translation

Just as a hard-knit woman wraps a cloth, the night absorbs scattered light. People who are capable of working and wise stop their work in the middle. People drop the bed when Savita Dev, who is restless and does the department of time, rises. (4)

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