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दूरदर्शिता का उपहार

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दूरदर्शिता का उपहार - HinduText Vedic Insights

एक दोपहर, बच्चों की टोली ने देखा कि नंबरदार चाचा किसी काम से गांव से बाहर गए हुए हैं। मौका पाकर बच्चों ने पेड़ पर ताबड़तोड़ पथराव कर दिया और सारी अमियां झाड़ दीं। बच्चे अमियां उठा-उठाकर अपने घर ले गए। कुछ ने उन्हें स्वाद लेकर खाया, तो कुछ ने खेल-खेल में बर्बाद कर दिया।

आज की इस भागती-दौड़ती और आत्मकेंद्रित दुनिया में इंसान का व्यवहार सिर्फ 'मैं और मेरे' तक सिमटकर रह गया है। आज हम उस दौर में जी रहे हैं जहां लोग तात्कालिक लाभ के लिए सालों पुराने रिश्तों को पल भर में तोड़ देते हैं, और अपनी सुख-सुविधा के लिए दूसरों के अधिकारों और प्रकृति को नुकसान पहुंचाने से भी नहीं हिचकिचाते। नई पीढ़ी जहां जरा सी असुविधा होने पर मर्यादाएं भूलकर आक्रोशित हो उठती है, वहीं पुरानी पीढ़ी भी कई बार उनके इस गुस्से को सही दिशा देने के बजाय उनसे दूरी बना लेती है। ऐसे समय में यह सवाल उठना लाजिम है कि क्या हम वाकई एक संवेदनशील समाज का निर्माण कर रहे हैं, या सिर्फ स्वार्थ की अंधी दौड़ में दौड़ रहे हैं? इसी कड़वे व्यावहारिक धरातल को छूती हुई यह कहानी हमें याद दिलाती है कि क्रोध का जवाब प्रतिशोध से नहीं बल्कि दूरदर्शिता से दिया जा सकता है।

एक समय की बात है। हरे-भरे खेतों के बीच बसे 'चंदनपुर' गांव में आपसी भाईचारा और प्रेम कूट-कूट कर भरा था। वहां सभी समुदाय के लोग आपस में मिलजुल कर रहा करते थे। इसी गांव में 55 की उम्र पार कर चुके एक व्यक्ति रहते थे - पूरण सिंह जी। उनकी उम्र और जीवन के अनुभव के कारण पूरा गांव उन्हें आदर से 'नंबरदार चाचा' कहकर पुकारता था। सभी उनका मान-सम्मान और आदर सत्कार किया करते थे।दूरदर्शिता का उपहार - HinduText Knowledge

गांव की चौपाल पर नंबरदार चाचा का एक छोटा सा मकान था। उस मकान के आंगन में आम का एक बहुत पुराना और विशाल पेड़ था। उस पेड़ पर लगने वाले रसीले आम पूरे गांव की साझी विरासत थे। क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या जवान... सभी बड़े चाव से उन आमों को खाते थे। नंबरदार चाचा स्वभाव से कड़क थे, लेकिन बच्चों से उन्हें बेहद लगाव था। हर साल जब बरसात के मौसम में आम पक कर सुनहरे हो जाते, तो चाचा गांव के सभी बच्चों को बुलाकर 'आम की विशेष दावत' दिया करते थे। पूरा आंगन बच्चों की किलकारियों से गूंज उठता था।

परंतु, जीवन के कुछ उतार-चढ़ाव और घरेलू व्यस्तताओं के कारण पिछले दो वर्षों से यह मधुर परंपरा टूट गई थी। बच्चे चाचा की इस बात से बहुत नाराज रहने लगे थे। वे सीधे कुछ कह तो नहीं सकते थे, क्योंकि नंबरदार चाचा का रौब भी बच्चों पर कम नहीं था।

अपनी इसी नाराजगी में, पहले साल तो बच्चों ने एक शरारत की - यह सोचकर कि चाचा ने उन्हें दावत नहीं दी, उन्होंने पेड़ पर पत्थर मारकर बहुत सी फसल बर्बाद कर दी।

दूरदर्शिता का उपहार - HinduText Knowledgeकहानी ने नया मोड़ तब लिया जब दूसरे साल आम के पेड़ पर बौर आया और छोटी-छोटी अमियां लटकने लगीं। एक दोपहर, बच्चों की टोली ने देखा कि नंबरदार चाचा किसी काम से गांव से बाहर गए हुए हैं। मौका पाकर बच्चों ने पेड़ पर ताबड़तोड़ पथराव कर दिया और सारी अमियां झाड़ दीं। बच्चे अमियां उठा-उठाकर अपने घर ले गए। कुछ ने उन्हें स्वाद लेकर खाया, तो कुछ ने खेल-खेल में बर्बाद कर दिया।

नंबरदार चाचा को जब वापस लौटकर इस बात का पता चला, तो उन्हें भीतर ही भीतर गहरा दुख और गुस्सा आया। मगर वे चतुर और ठंडे दिमाग के व्यक्ति थे, वे अपने गुस्से को पी गए। वे बच्चों को सजा नहीं देना चाहते थे, बल्कि उन्हें एक ऐसा सबक सिखाना चाहते थे जो जीवनभर उनके काम आए। वे सही मौके की तलाश करने लगे।

तीसरा साल आया। आम का मौसम फिर लौटा। इस बार नंबरदार चाचा ने ठान लिया कि इस साल की दावत को यादगार बनाना है। पिछले दो साल के नुकसान के कारण अपने पेड़ के आम कम थे, इसलिए उन्होंने कई हफ्ते पहले से आस-पास के गांवों से बाजार के जरिए ढेर सारे अव्वल दर्जे के आम मंगवाकर धीरे-धीरे अपने घर के छप्पर के नीचे जमा करना शुरू कर दिया, और उन्हें पुआल से ढक दिया ताकि पकने तक सुरक्षित रहें और किसी की नजर न पड़े। यह सब उन्होंने बड़ी चुप्पी से किया, ताकि बच्चों के लिए एक सरप्राइज बना रहे। फिर उन्होंने पूरे गांव में मुनादी करवा दी - "आज शाम नंबरदार चाचा के घर पर गांव के सभी बच्चों की आम की दावत है!"

इस ऐलान को सुनकर बच्चे हैरान-परेशान रह गए। वे खुश तो थे, पर डरे हुए भी थे कि कहीं चाचा पिछले साल का बदला तो नहीं ले रहे? उस दिन आसमान में काली घटाएं छाई थीं और हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी। कुछ बच्चे डर के मारे नहीं गए, लेकिन कुछ इस डर से चले गए कि न जाने पर चाचा और नाराज हो जाएंगे। बहरहाल, आधे से अधिक बच्चे नंबरदार चाचा के आंगन में इकट्ठा हो गए।

मौसम सुहाना था। ठंडी-ठंडी हवा के झोंकों के बीच बच्चे झिझक भूलकर मजे से आम खाने लगे। जब आम समाप्त हो गए और तृप्ति के कारण बच्चे अंगड़ाई लेने लगे, तभी 'चीकू' नाम के एक नटखट बच्चे की नजर घर के एक कोने की तरफ गई। वहां छप्पर के नीचे पुआल (घास-फूस) से ढका हुआ एक बहुत बड़ा ढेर लगा था। चीकू ने फुसफुसाते हुए यह बात अन्य बच्चों को इशारे से बताई।

सबके मन में उत्सुकता जाग उठी। आखिरकार, चीकू ने डरते-डरते पूछ ही लिया - "चाचा जी! इस कोने में पुआल के नीचे आपने क्या छुपा रखा है?"

चीकू की बात सुनकर नंबरदार चाचा खिलखिलाकर हंस पड़े। उनकी हंसी ने माहौल का सारा डर गायब कर दिया। चाचा ने बच्चों को पास बुलाया और अपनी पिछली भूल (दो साल दावत न दे पाने) पर खेद व्यक्त किया।दूरदर्शिता का उपहार - HinduText Knowledge

फिर वे गंभीर होकर बोले - "सुनो बच्चों… आम तो तुम्हें हर साल मिलेंगे ही, लेकिन अगर तुम मेरे इस दुनिया से जाने के बाद भी ऐसे ही मीठे आम खाना चाहते हो, तो मेरे पीछे आओ।"

चाचा छप्पर की ओर बढ़े और बच्चों की टोली भी उत्सुकता में उनके पीछे हो ली। चाचा ने जैसे ही पुआल हटाई, बच्चों की आंखें फटी की फटी रह गई। वहां पके हुए खुशबूदार आमों का पहाड़ लगा था — वही आम जो चाचा ने हफ्तों की मेहनत से जुटाए थे।

चाचा मुस्कुराए और बोले - "बच्चों! अपने दोनों हाथों में भरकर जितने भी आम ले जा सकते हो, ले जाओ।"

बच्चों ने शोर मचाते हुए खुशी-खुशी अपनी झोलियां और हाथ आमों से भर लिए। बच्चों के चेहरों पर वो निश्छल खुशी देखकर नंबरदार चाचा की बूढ़ी आंखों में आंसू छलक आए। वे भर्राई आवाज में बोले - "सुनो बच्चों! अपने-अपने घर जाकर इन आमों को पेट भरकर खाओ। मगर इस बार एक काम करना… इनकी गुठलियों को फेंकना मत। उन्हें अपने घरों के आस-पास और पूरे गांव की खाली जमीन पर बो देना।"

तभी बच्चों के बीच से एक धीमी और संशयी आवाज उभरी - "लेकिन चाचा जी, उन गुठलियों से पेड़ बनने और आम आने में तो कितने साल लग जाएंगे? तब तक हम क्या करेंगे?"

दूरदर्शिता का उपहार - HinduText Knowledgeनंबरदार चाचा ने उस आवाज को सुन लिया था। उन्होंने जाते हुए बच्चों को रोका। उन्होंने अपने पास खड़े अपने समझदार बेटे 'माधव' के कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्यार से बोले - "जब तक तुम्हारे द्वारा बोए गए पौधों पर आम आएं, तब तक तुम मेरे इस पेड़ से हर साल आम खाना। मेरा बेटा माधव हमेशा तुम्हारे बीच यहीं रहेगा। यह मेरी तरह ही तुम्हें हर साल इसी आंगन में बुलाकर आम खिलाएगा। और फिर… जब तुम्हारे लगाए पेड़ों पर फल आने लगेंगे, तो तुम जिंदगी भर अपने खुद के पेड़ों से मीठे आम खाना और अपनी आने वाली पीढ़ी को खिलाना।"

नंबरदार चाचा की यह दूरदर्शी बात सुनकर बच्चों के दिल बाग-बाग हो गए। उनका सारा संकोच सम्मान में बदल गया। बच्चे शोर मचाते और 'नंबरदार चाचा जिंदाबाद!' के नारे लगाते हुए खुशी-खुशी अपने घरों की ओर दौड़ पड़े। उस दिन उन्होंने सिर्फ आम नहीं, बल्कि सुनहरे भविष्य के बीज अपने हाथों में थामे हुए थे।


सीख : - परोपकारी व्यक्ति का स्वभाव कुछ समय के लिए परिस्थितिवश सुप्त भले हो जाए, लेकिन वह कभी समाप्त नहीं होता। इस कहानी से हमें यह अनमोल सीख मिलती है कि यदि हम अपने भविष्य को सुखी, समृद्ध और छायादार (आरामदायक) बनाना चाहते हैं, तो उसके लिए निस्वार्थ भाव से प्रयास आज से ही शुरू करने होंगे। दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भरता के बीज बोना ही सच्ची बुद्धिमानी है।

lekhraj thakur
Written By

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