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Dr. Anuradha Sharma
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Asked Aug 27, 2026 at 07:12 PM • Hindu Philosophy

सनातन धर्म में मूर्ति पूजा का वास्तविक दार्शनिक आधार क्या है?

सनातन परंपरा में साकार (सगुण) और निराकार (निर्गुण) दोनों उपासनाओं को स्थान दिया गया है। वेदों में जहाँ निराकार सर्वव्यापी ईश्वर की स्तुति है, वहीं पुराणों और आगमों में विग्रह (मूर्ति) पूजा को अत्यंत महत्त्व दिया गया है। एक साधक के लिए विग्रह आराधना का आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक महत्त्व क्या है?

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Pt. Shailesh Upadhyay
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Answered 2 months ago

अनुराधा जी, यह प्रश्न सनातन धर्म के समन्वयवादी दृष्टिकोण को समझने की कुंजी है।

१. अरूप से रूप की यात्रा:
ईश्वर सर्वव्यापी और निराकार है—जैसे वायु सर्वत्र है, परंतु उसका अनुभव करने के लिए हमें पंखा चाहिए; जैसे दूध में मक्खन सर्वत्र व्याप्त है, परंतु उसे निकालने के लिए मंथन की प्रक्रिया चाहिए। इसी प्रकार विग्रह (मूर्ति) निराकार परब्रह्म का साकार प्रतीक (Symbolic Manifestation) है।

२. चित्त की एकाग्रता (Alambana):
पतंजलि योगसूत्र और वेदान्त दोनों स्वीकार करते हैं कि साधारण मानव मन अमूर्त (Abstract) पर तुरंत एकाग्र नहीं हो सकता। जब मन को एक आलम्बन (Form/Image) दिया जाता है, जिसमें तेज, करुणा, ज्ञान और पवित्रता के भाव हों, तो चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं।

३. प्राण-प्रतिष्ठा का रहस्य:
सनातन धर्म में केवल पाषाण या धातु की पूजा नहीं होती। जब तक वैदिक मंत्रों द्वारा उसमें 'प्राण-प्रतिष्ठा' नहीं होती, वह केवल एक कलाकृति है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद वह विग्रह साधक के लिए साक्षात् ईश्वरीय ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।

श्रीमद्भागवत में भगवान कहते हैं:
"मनो-मय्यात्म-रूपेण मन्मयीं मूर्तिमुद्वहन्।"
विग्रह के माध्यम से साधक धीरे-धीरे स्थूल से सूक्ष्म और अंततः सर्वव्यापक चैतन्य की ओर अग्रसर होता है।

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Mukesh Chandra Joshi
Mukesh Chandra Joshi 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 520

Answered 1 month ago

श्रीमद्भगवद्गीता (१२.५) में स्पष्ट है: 'क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्' — अव्यक्त (निराकार) में मन लगाना देहधारियों के लिए अत्यंत कठिन है। साकार उपासना मन को सहज ही परमात्मा से जोड़ देती है।

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Pooja Rajvanshi
Pooja Rajvanshi 310

Answered 1 month ago

शैव और वैष्णव आगमों में मूर्ति निर्माण के लिए शिल्पशास्त्र का कड़ा विधान है। रूप, अनुपात और मुद्राओं (Mudras) के माध्यम से मानव मस्तिष्क में शांति, अभय और भक्ति के भाव स्वतः संचारित होते हैं।

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Root scriptural evidence and verses from the Vedas

ऋग्वेद मण्डल 9, सूक्त 45, मन्त्र 6

तया॑ पवस्व॒ धार॑या॒ यया॑ पी॒तो वि॒चक्ष॑से । इन्दो॑ स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म् ॥ (६)

हे सोम! जिस रसधारा को पीने वाले चतुर स्तोता को तुम शोभन वीर्य प्रदान करते हो, उसी धारा से नीचे बहो. (६)

ऋग्वेद मण्डल 3, सूक्त 1, मन्त्र 13

अ॒पां गर्भं॑ दर्श॒तमोष॑धीनां॒ वना॑ जजान सु॒भगा॒ विरू॑पम् । दे॒वास॑श्चि॒न्मन॑सा॒ सं हि ज॒ग्मुः पनि॑ष्ठं जा॒तं त॒वसं॑ दुवस्यन् ॥ (१३)

सौभाग्यशाली एवं सुखदाता अरणि ने दर्शनीय एवं भांति-भांति की ओषधियों के गर्भ के समान अग्नि को जन्म दिया. समस्त देव स्तुतियोग्य, उन्नत एवं तुरंत उत्पन्न अग्नि के समीप स्तुति करते हुए गए एवं उन्होंने अग्नि की सेवा की. (१३)

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 42, मन्त्र 7

अति॑ नः स॒श्चतो॑ नय सु॒गा नः॑ सु॒पथा॑ कृणु । पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः ॥ (७)

हमें बाधा पहुंचाने के लिए आए हुए शत्रुओं से हमें दूर ले जाओ. हमारा मार्ग सुगम और शोभन बनाओ. हे पूषा! इस मार्ग में हमारी रक्षा का उत्तरदायित्व तुम्हारा है. (७)

Related Upanishads

केनोपनिषद् खण्ड/अध्याय 3, मन्त्र 7

अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ७॥

देवता तब वायुदेव से बोले कि हे वायो ! तुम जाकर देखो कि यह यक्ष कौन है। वायु ने कहा-बहुत अच्छा। ॥७॥

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कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 1, मन्त्र 6

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥

जिस प्रकार पूर्वपुरुष व्यवहार करते थे उसका विचार कीजिये तथा जैसे वर्तमानकालीन अन्य लोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये। मनुष्य खेतीकी तरह पकता (वृद्ध होकर मर जाता) है और खेतीकी भाँति फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 15, श्लोक 20

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ | एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ||१५-२०||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 46

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ||२-४६||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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Asked Aug 27, 2026
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