जोशी जी, आपने वेदान्त के सबसे बहुप्रतीक्षित और गलत समझे जाने वाले विषय पर प्रश्न पूछा है।
अद्वैत वेदान्त में तीन प्रकार की सत्ताओं (Orders of Reality) का वर्णन आता है:
- प्रतिभासिक सत्ता (Illusory Reality): जैसे रस्सी में सांप का दिखना या स्वप्न देखना। जाग्रत होते ही यह तुरंत बाधित (नष्ट) हो जाता है।
- व्यावहारिक सत्ता (Empirical Reality): यह वह संसार है जिसमें हम सब जीते हैं, खाते-पीते हैं, समाज और कर्तव्य निभाते हैं। जब तक आत्म-ज्ञान नहीं होता, तब तक यह संसार शत-प्रतिशत सत्य और प्रभावी है। भूख लगने पर भोजन ही करना पड़ता है।
- पारमार्थिक सत्ता (Absolute Reality): केवल परब्रह्म, जो त्रिकाल अबाधित (अतीत, वर्तमान, भविष्य में कभी न बदलने वाला) है।
'मिथ्या' का वास्तविक अर्थ:
संस्कृत में 'मिथ्या' का अर्थ 'झूठ' या 'असत्य' नहीं, बल्कि 'अनिर्वचनीय' (न सत्, न असत्) है। अर्थात् जो नित्य नहीं है, जिसका स्वरूप परिवर्तनशील है। जैसे मिट्टी से बना घड़ा—घड़ा रूप में सत्य दिखता है, लेकिन मूलतः वह मिट्टी ही है।
इसलिए आदि शंकराचार्य जी ने कभी कर्म या कर्तव्यों का तिरस्कार नहीं किया, बल्कि अद्वैत बोध के साथ निष्काम भाव से लोक-कल्याण करने की प्रेरणा दी है।
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