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Mukesh Chandra Joshi
Mukesh Chandra Joshi 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 520

Asked Aug 27, 2026 at 03:12 AM • Advaita Vedanta

अद्वैत वेदान्त के अनुसार 'माया' क्या है? क्या संसार पूर्णतः असत्य अथवा काल्पनिक है?

विद्वान मित्रों,

शंकराचार्य जी के प्रसिद्ध कथन "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" को लेकर अक्सर यह भ्रम फैलता है कि यदि जगत् मिथ्या है, तो क्या हमें अपने सांसारिक कर्तव्यों, समाज और नीति-नियमों को त्याग देना चाहिए? 'मिथ्या' और 'असत्य' (जैसे वंध्या-पुत्र या आकाश-कुसुम) में क्या तात्विक भेद है? कृपया स्पष्ट करें।

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Pt. Shailesh Upadhyay
Pt. Shailesh Upadhyay 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 380

Answered 1 month ago

माया की दो शक्तियां बताई गई हैं: आवरण और विक्षेप। आवरण शक्ति सत्य (ब्रह्म) को छुपाती है, और विक्षेप शक्ति असत्य (द्वैत जगत्) का भान कराती है। ज्ञान से आवरण हटते ही केवल परब्रह्म ही शेष रहता है।

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Raghavendra Kulkarni
Raghavendra Kulkarni 290

Answered 2 months ago

जोशी जी, आपने वेदान्त के सबसे बहुप्रतीक्षित और गलत समझे जाने वाले विषय पर प्रश्न पूछा है।

अद्वैत वेदान्त में तीन प्रकार की सत्ताओं (Orders of Reality) का वर्णन आता है:

  1. प्रतिभासिक सत्ता (Illusory Reality): जैसे रस्सी में सांप का दिखना या स्वप्न देखना। जाग्रत होते ही यह तुरंत बाधित (नष्ट) हो जाता है।
  2. व्यावहारिक सत्ता (Empirical Reality): यह वह संसार है जिसमें हम सब जीते हैं, खाते-पीते हैं, समाज और कर्तव्य निभाते हैं। जब तक आत्म-ज्ञान नहीं होता, तब तक यह संसार शत-प्रतिशत सत्य और प्रभावी है। भूख लगने पर भोजन ही करना पड़ता है।
  3. पारमार्थिक सत्ता (Absolute Reality): केवल परब्रह्म, जो त्रिकाल अबाधित (अतीत, वर्तमान, भविष्य में कभी न बदलने वाला) है।

'मिथ्या' का वास्तविक अर्थ:
संस्कृत में 'मिथ्या' का अर्थ 'झूठ' या 'असत्य' नहीं, बल्कि 'अनिर्वचनीय' (न सत्, न असत्) है। अर्थात् जो नित्य नहीं है, जिसका स्वरूप परिवर्तनशील है। जैसे मिट्टी से बना घड़ा—घड़ा रूप में सत्य दिखता है, लेकिन मूलतः वह मिट्टी ही है।

इसलिए आदि शंकराचार्य जी ने कभी कर्म या कर्तव्यों का तिरस्कार नहीं किया, बल्कि अद्वैत बोध के साथ निष्काम भाव से लोक-कल्याण करने की प्रेरणा दी है।

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Dr. Anuradha Sharma
Dr. Anuradha Sharma 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 450

Answered 1 month ago

अक्सर लोग अद्वैत को शून्यवाद समझ लेते हैं, जो गलत है। अद्वैत संसार को नष्ट नहीं करता, बल्कि संसार के पीछे छिपे शाश्वत सत्य को देखने की दृष्टि प्रदान करता है।

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Pooja Rajvanshi
Pooja Rajvanshi 310

Answered 1 month ago

सांख्य दर्शन में जिसे 'प्रकृति' कहा गया है, अद्वैत में उसे ही ब्रह्म की अचिन्त्य शक्ति 'माया' कहा गया है। जब तक देहाभिमान है, माया सत्य की तरह व्यवहार करती है।

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ऋग्वेद मण्डल 8, सूक्त 47, मन्त्र 17

यथा॑ क॒लां यथा॑ श॒फं यथ॑ ऋ॒णं सं॒नया॑मसि । ए॒वा दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ सर्व॑मा॒प्त्ये सं न॑यामस्यने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑ ॥ (१७)

हे उषा! जिस प्रकार यज्ञ में बलि दिए गए पशु के हृदय, खुर, सींग आदि अंग क्रम से लिए जाते हैं अथवा जिस प्रकार ऋण धीरे-धीरे दिया जाता है, उसी प्रकार आप्त्यत्रित के सभी बुरे स्थान धीरे-धीरे दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१७)

ऋग्वेद मण्डल 5, सूक्त 46, मन्त्र 4

उ॒त नो॒ विष्णु॑रु॒त वातो॑ अ॒स्रिधो॑ द्रविणो॒दा उ॒त सोमो॒ मय॑स्करत् । उ॒त ऋ॒भव॑ उ॒त रा॒ये नो॑ अ॒श्विनो॒त त्वष्टो॒त विभ्वानु॑ मंसते ॥ (४)

विष्णु अथवा अहिंसक वायु अथवा धन देने वाले सोम हमें सुख दें. ऋभुगण, अश्चिनीकुमार, त्वष्टा एवं विभु हमें धन देने के लिए प्रसन्न हों. (४)

ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 72, मन्त्र 2

ब्रह्म॑ण॒स्पति॑रे॒ता सं क॒र्मार॑ इवाधमत् । दे॒वानां॑ पू॒र्व्ये यु॒गेऽस॑तः॒ सद॑जायत ॥ (२)

लोहार जिस प्रकार धौंकनी चलाता है, उसी प्रकार ब्रह्मणस्पति ने देवों को उत्पन्न किया. देवों से पूर्व के समय में असत्‌ से सत्‌ उत्पन्न हुआ. (२)

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कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 3, मन्त्र 17

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥ तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥

जो पुरुष इस परमगुह्य ग्रन्थको पवित्रतापूर्वक ब्राह्मणोंकी सभामें अथवा श्राद्धकालमें सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है, अनन्त फलवाला होता है ॥ १७ ॥

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कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 1, मन्त्र 24

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥

इसीके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका माँग ले। हे नचिकेताः! इस विस्तृत भूमिमें तू वृद्धिको प्राप्त हो। मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ॥ २४॥

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 29

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 27

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि | तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ||१-२७||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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