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Pt. Shailesh Upadhyay
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Asked Aug 28, 2026 at 03:12 AM • Dharma Shastra

वर्ण व्यवस्था और जन्म आधारित जाति में क्या मौलिक अंतर है? शास्त्रों में इसका क्या स्वरूप मिलता है?

अक्सर आधुनिक विमर्श में 'वर्ण' और 'जाति' को एक ही समझ लिया जाता है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त और श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय के अनुसार वर्ण का निर्धारण किस आधार पर बताया गया है और कालांतर में यह जन्मगत कैसे हुआ?

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Dr. Anuradha Sharma
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Answered 1 month ago

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो मैगस्थनीज की 'इंडिका' और अल-बरूनी के विवरणों में भी भारत की सामाजिक व्यवस्था में गतिशीलता (Social Mobility) का उल्लेख मिलता है। ब्रिटिश जनगणना (1881-1901) ने जातियों को कठोर कानूनी रूप दिया।

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ऋग्वेद मण्डल 9, सूक्त 72, मन्त्र 6

अं॒शुं दु॑हन्ति स्त॒नय॑न्त॒मक्षि॑तं क॒विं क॒वयो॒ऽपसो॑ मनी॒षिणः॑ । समी॒ गावो॑ म॒तयो॑ यन्ति सं॒यत॑ ऋ॒तस्य॒ योना॒ सद॑ने पुन॒र्भुवः॑ ॥ (६)

कवि, कर्मवाले एवं बुद्धिमान्‌ ऋत्विज्‌ शब्द करते हुए, क्षीणतारहित एवं क्रांतकर्म वाले सोम को निचोड़ते हैं. इसके बाद बार-बार उत्पन्न होने वाली गाएं एवं स्तुतियां परस्पर मिलकर यज्ञस्थान अर्थात्‌ उत्तरवेदी सोम से मिलती हैं. (६)

ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 88, मन्त्र 8

सू॒क्त॒वा॒कं प्र॑थ॒ममादिद॒ग्निमादिद्ध॒विर॑जनयन्त दे॒वाः । स ए॑षां य॒ज्ञो अ॑भवत्तनू॒पास्तं द्यौर्वे॑द॒ तं पृ॑थि॒वी तमापः॑ ॥ (८)

देवों ने सबसे पहले मन से सूक्त वचन का चिंतन किया. इसके पश्चात्‌ हव्य को उत्पन्न किया. वे अग्नि देवों के यज्ञपात्र एवं शरीररक्षक बने. उन अग्नि को झुलोक, पृथ्वी और अंतरिक्ष जानते हैं. (८)

ऋग्वेद मण्डल 9, सूक्त 97, मन्त्र 22

तक्ष॒द्यदी॒ मन॑सो॒ वेन॑तो॒ वाग्ज्येष्ठ॑स्य वा॒ धर्म॑णि॒ क्षोरनी॑के । आदी॑माय॒न्वर॒मा वा॑वशा॒ना जुष्टं॒ पतिं॑ क॒लशे॒ गाव॒ इन्दु॑म् ॥ (२२)

जब अभिलाषा करने वाले स्तोता का वचन इसका संस्कार करता है और योगक्षेम संबंधी देहाती के मुख में स्थित वाणी राजा की स्तुति करती है, तब वरण करने योग्य, देवों के नशे के लिए पर्याप्त, सबके पालक एवं कलश में स्थित सोम की अभिलाषा करती हुई गाएं इसके पास आती हैं. (२२)

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ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) खण्ड/अध्याय 1, मन्त्र 15

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५॥

प्रश्न-परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान मनुष्य को क्यों नहीं होता। चमकीले सुवर्णादि के पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। हे सबके पोषक परमात्मन् ! आप उस सत्य स्वरूप के दर्शन के लिये उस आवरण को हटा दो। इसका यह आशय है कि धनका लालच ही मनुष्य को धर्म से से विमुख कर देता है। धन के लोभ मे मनुष्य अधर्म की ओर प्रवृत होता है। ऐसी दशा में सत्य स्वरूप भगवान् का दर्शन मनुष्य को कदापि नहीं हो सकता, इसलिये मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन् ! आप उस आवरण को हटा दें, जिससे अविनाशी प्रभु के दर्शन हो सकें (यहां सत्य शब्द धर्म और ईश्वर दोनों का वाचक है ) । ॥१५॥

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केनोपनिषद् खण्ड/अध्याय 1, मन्त्र 3

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः । न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ३॥

वहाँ उस ब्रह्म तक न आँखें पहुँचती हैं, न वाणी पहुँचती है, न मन पहुँचता है, अतः जिस प्रकार उसका इस ब्रह्म का उपदेश करना चाहिए वह न हम जानते हैं, न ही यह समझते हैं कि इस दशा में किस प्रकार कोई इसका उपदेश करे क्योंकि वह ब्रह्म जानने योग्य विषय से भिन्न है तथा अज्ञात से भी परे है – ऐसा हमने अपने पूर्वजों से सुना है। ॥३॥

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9, श्लोक 2

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् | प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ||९-२||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 31

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि | धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ||२-३१||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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