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Pt. Shailesh Upadhyay
Pt. Shailesh Upadhyay 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 380

Answered 1 month ago

ऋग्वेद (१.१६४.४६) का शाश्वत महावाक्य है: 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' — सत्य (ईश्वर) एक ही है, ज्ञानी जन उसे अनेक नामों और रूपों में पुकारते हैं। जैसे एक ही जल को विभिन्न भाषाओं में पानी, Water, नीर कहा जाता है, वैसे ही परब्रह्म के विभिन्न कार्य और रूप हैं।

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Dr. Anuradha Sharma
Dr. Anuradha Sharma 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 450

Answered 1 month ago

वेदों में 33 कोटि देवताओं का उल्लेख है, जहाँ 'कोटि' का अर्थ 'प्रकार' (33 Types / Supreme Principles) है, न कि 33 करोड़। इनमें 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, इन्द्र और प्रजापति सम्मिलित हैं जो प्रकृति के संतुलन को दर्शाते हैं।

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Pooja Rajvanshi
Pooja Rajvanshi 310

Answered 1 month ago

सनातन धर्म में 'इष्टदेवता' की सुंदर संकल्पना है। हर व्यक्ति की मानसिक प्रकृति (स्वभाव) भिन्न होती है। कोई मातृत्व भाव से माँ दुर्गा को पूजता है, कोई सखा भाव से श्रीकृष्ण को, कोई वैराग्य भाव से महादेव को। यह आध्यात्मिकता का लोकतंत्र (Spiritual Freedom) है।

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Mukesh Chandra Joshi
Mukesh Chandra Joshi 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 520

Answered 1 month ago

वृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य-शाकल्य संवाद में अंततः 33 से घटकर केवल 'एक ब्रह्म' पर ही प्रतिष्ठा होती है। अनेकता में एकता ही सनातन का प्राण है।

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ऋग्वेद मण्डल 3, सूक्त 29, मन्त्र 9

कृ॒णोत॑ धू॒मं वृष॑णं सखा॒योऽस्रे॑धन्त इतन॒ वाज॒मच्छ॑ । अ॒यम॒ग्निः पृ॑तना॒षाट् सु॒वीरो॒ येन॑ दे॒वासो॒ अस॑हन्त॒ दस्यू॑न् ॥ (९)

हे मित्र अध्वर्यु! तुम अरणिमंथन द्वारा कामवर्षक अग्नि को उत्पन्न करो. यदि वह उत्पन्न न हो तो तुम सामर्थ्यवान्‌ बनकर मंथनरूपी युद्ध में लगो. शोभन सामर्थ्य वाले अग्नि सेना के विजेता हैं. इन्हीं की सहायता से देवों ने असुरों को पराजित किया था. (९)

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 71, मन्त्र 7

अ॒ग्निं विश्वा॑ अ॒भि पृक्षः॑ सचन्ते समु॒द्रं न स्र॒वतः॑ स॒प्त य॒ह्वीः । न जा॒मिभि॒र्वि चि॑किते॒ वयो॑ नो वि॒दा दे॒वेषु॒ प्रम॑तिं चिकि॒त्वान् ॥ (७)

जिस प्रकार विशाल सात सरिताएं सागर के पास पहुंचती हैं, उसी प्रकार समस्त हव्य अन्न अग्नि को प्राप्त होते हैं. हमारे पास इतना कम अन्न है कि हमारी जाति वाले उसका भाग नहीं पाते. इसलिए तुम देवों में मननीय धन को जानकर हमें प्राप्त कराओ. (७)

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 19, मन्त्र 4

य उ॒ग्रा अ॒र्कमा॑नृ॒चुरना॑धृष्टास॒ ओज॑सा । म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥ (४)

हे अग्नि! जो मरुद्गण उग्र एवं इतने बलशाली हैं कि कोई उनका तिरस्कार नहीं कर सकता. उन्होंने जल की वर्षा की है. तुम उनके साथ आओ. (४)

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कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 6, मन्त्र 15

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ॥ १५ ॥

जिस समय इस जीवनमें ही इसके हृदयकी सम्पूर्ण ग्रन्थियोंका छेदन हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस सम्पूर्ण वेदान्तोंका इतना ही आदेश है ॥ १५ ॥

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9, श्लोक 12

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ||९-१२||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 8

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः | प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ||७-८||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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Asked Aug 26, 2026
Topic Philosophy
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