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Pooja Rajvanshi
Pooja Rajvanshi 310

Asked Aug 26, 2026 at 01:12 PM • Upanishads

मांडूक्य उपनिषद् में वर्णित 'तुरीय' अवस्था क्या है और यह जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति से कैसे भिन्न है?

प्रणाम सभी को,

मांडूक्य उपनिषद् में चेतना की चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है— १. वैश्वानर (जाग्रत अवस्था - Waking) २. तैजस (स्वप्न अवस्था - Dreaming) ३. प्राज्ञ (सुषुप्ति अवस्था - Deep Sleep) ४. तुरीय (चतुर्थ अवस्था)

प्रश्न यह है कि तुरीय अवस्था को कोई अलग अवस्था क्यों नहीं बल्कि केवल 'चतुर्थ' (Fourth) कहा गया? क्या तुरीय का अनुभव सामान्य मनुष्य ध्यान के माध्यम से कर सकता है? कृपया इस पर उपनिषदीय दृष्टिकोण से प्रकाश डालें।

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Pt. Shailesh Upadhyay
Pt. Shailesh Upadhyay 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 380

Answered 2 months ago

पूजा जी, मांडूक्य उपनिषद् वेदान्त का सार है। आचार्य गौड़पाद की कारिका और मांडूक्य उपनिषद् के सातवें मंत्र में तुरीय का अत्यंत विलक्षण निरूपण हुआ है:

नान्तप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्।
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः॥ (मांडूक्य मंत्र ७)

१. तुरीय कोई 'अवस्था' नहीं, स्वयं आधार (Witness) है:
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति आती-जाती रहती हैं। जैसे सिनेमा के पर्दे पर कभी सुखद दृश्य आता है, कभी दुखद और कभी पर्दा खाली रहता है—किन्तु पर्दा स्वयं किसी दृश्य से न तो भीगता है और न जलता है। ठीक वैसे ही, तुरीय वह नित्य चैतन्य (Pure Consciousness) है जो तीनों अवस्थाओं का साक्षी है।

२. तीनों का विश्लेषण:

  • जाग्रत: बहिर्मुखी चेतना, जहाँ इन्द्रियाँ और विषय सक्रिय हैं।
  • स्वप्न: अन्तर्मुखी चेतना, जहाँ मन पूर्व संस्कारों से अपनी सृष्टि रचता है।
  • सुषुप्ति: अविद्या का आवरण, जहाँ मन लीन होता है और प्रज्ञानघन की स्थिति होती है (गाढ़ी निद्रा)।
  • तुरीय: जब साधक समझता है कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों का अनुभव करने वाला 'मैं' शुद्ध आत्म-स्वरूप हूँ।

३. अनुभव की विधि:
साधना में जब प्रणव (ॐ) के तीन मात्रायें—अ-कार (जाग्रत), उ-कार (स्वप्न), म-कार (सुषुप्ति) का लय 'अमात्र' (शांत ओंकार ध्वनि के उपरांत की नीरवता) में होता है, तब बुद्धि तुरीय भाव में प्रतिष्ठित होती है। यह कोई शून्य नहीं, बल्कि पूर्ण बोध की स्थिति है।

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Raghavendra Kulkarni
Raghavendra Kulkarni 290

Answered 1 month ago

दैनिक जीवन में जब हम ध्यान (Meditation) की गहरी अवस्था में बैठते हैं, जहाँ विचार रुक जाते हैं किन्तु पूर्ण जागरूकता बनी रहती है, वह तुरीय का ही एक प्रारंभिक क्षणिक आभास (Glimpse) है।

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Mukesh Chandra Joshi
Mukesh Chandra Joshi 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 520

Answered 1 month ago

छांदोग्य और मांडूक्य दोनों में ॐकार की त्रिमात्रा (अ, उ, म) को क्रमशः जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और जो मात्रा-रहित अखंड नाद है, उसे तुरीय कहा गया है। यह अद्वैत का सर्वोच्च शिखर है।

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ऋग्वेद मण्डल 2, सूक्त 27, मन्त्र 10

त्वं विश्वे॑षां वरुणासि॒ राजा॒ ये च॑ दे॒वा अ॑सुर॒ ये च॒ मर्ताः॑ । श॒तं नो॑ रास्व श॒रदो॑ वि॒चक्षे॒ऽश्यामायूं॑षि॒ सुधि॑तानि॒ पूर्वा॑ ॥ (१०)

हे वरुण! चाहे असुर हों, देव हों अथवा मनुष्य हों, तुम सबके राजा हो. हमें सौ वर्ष तक देखने की शक्ति दो. हम पूर्वजों द्वारा भोगी हुई अवस्था को प्राप्त करें. (१०)

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 144, मन्त्र 3

युयू॑षतः॒ सव॑यसा॒ तदिद्वपुः॑ समा॒नमर्थं॑ वि॒तरि॑त्रता मि॒थः । आदीं॒ भगो॒ न हव्यः॒ सम॒स्मदा वोळ्हु॒र्न र॒श्मीन्सम॑यंस्त॒ सार॑थिः ॥ (३)

समान अवस्था वाले एवं समान प्रयोजन की सिद्धि के लिए एक-दूसरे की बहुत कुछ सहायता करते हुए होता एवं अध्वर्यु अग्नि के शरीर में अपना-अपना यश मिलाते हैं. जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों को समेटते हैं एवं सारथि घोड़ों की लगाम पकड़ता है, उसी प्रकार अग्नि हमारे द्वारा डाली गई घृतधाराओं को स्वीकार करते हैं. (३)

ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 85, मन्त्र 42

इ॒हैव स्तं॒ मा वि यौ॑ष्टं॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुतम् । क्रीळ॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ॒ स्वे गृ॒हे ॥ (४२)

हे वर और वधू! तुम दोनों यहीं रहो, एक-दूसरे से अलग मत होओ एवं पूरी अवस्था प्राप्त करो. तुम पुत्रों और नातियों के साथ खेलते हुए अपने घर में प्रसन्न रहो. (४२)

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केनोपनिषद् खण्ड/अध्याय 4, मन्त्र 3

तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३॥

यहाँ उपनिषद् में दो पक्ष प्रकट किए गये हैं एक आध्यात्मिक और दूसरा अधिदैवत । आध्यात्मिक पक्ष में तो इन्द्रिय और आत्मा का ग्रहण होता है, और अधिदैवत में अग्नि, वायु और सूर्य का ग्रहण होता है । आशय यह है कि आँखों से भगवान् की विभूति देख कर और कानों से सुन कर ही आत्मा को भगवान् का ज्ञान होता है, इसी तरह नास्तिक जन भी अग्नि, वायु और सूर्य के सामर्थ्य को देख कर ही परमात्मा के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त करते हैं। ये ही तत्व देव नाम से ग्रहण किये जाते हैं। इसीलिये समस्त देवताओं मे इन्द्र ही सब से बढ़ कर हैं। क्योंकि उन्ही ने ब्रह्म का समीपस्थ्य प्राप्त कर सर्वप्रथम ब्रह्मविद्या रुपी उमा से ब्रह्म के विषय मे जाना। आध्यात्मिक पक्ष मे - इन्द्रियों में आत्मा ही सब से बड़ा देव है क्योंकि इसी ने बुद्धि के द्वारा सब से पहले ब्रह्म स्वरुप का साक्षात्कार किया। अधिदैवत पक्ष में - सूर्य ही सब भौतिक देवों में बड़ा देव है क्योंकि मनुष्य की सारी बुद्धि उसको न जान कर अन्त में यही विचार करती है कि इसका रचयिता अवश्य कोई अनन्त शक्तिमय प्रभु है। ॥३॥

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ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) खण्ड/अध्याय 1, मन्त्र 7

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७॥

विशेष ज्ञान सम्पन्न योगी की दृष्टि में जब सम्पूर्ण चराचर जगत् परमात्मा ही हो जाता है उस अवस्था में परमात्मा के एकत्व को देखने वाले उस योगी के लिये मोह और शोक कहां। अर्थात् मोह और शोक के स्थान तो भौतिक पदार्थ हैं जब उनसे सम्बन्ध त्याग कर मुमुक्ष केवल एक ब्रह्म को ही सर्वत्र देखता है। तब उसे मोह शोकादि नहीं सताते । ॥७॥

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त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन | निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||२-४५||

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