पूजा जी, मांडूक्य उपनिषद् वेदान्त का सार है। आचार्य गौड़पाद की कारिका और मांडूक्य उपनिषद् के सातवें मंत्र में तुरीय का अत्यंत विलक्षण निरूपण हुआ है:
नान्तप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्।
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः॥ (मांडूक्य मंत्र ७)
१. तुरीय कोई 'अवस्था' नहीं, स्वयं आधार (Witness) है:
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति आती-जाती रहती हैं। जैसे सिनेमा के पर्दे पर कभी सुखद दृश्य आता है, कभी दुखद और कभी पर्दा खाली रहता है—किन्तु पर्दा स्वयं किसी दृश्य से न तो भीगता है और न जलता है। ठीक वैसे ही, तुरीय वह नित्य चैतन्य (Pure Consciousness) है जो तीनों अवस्थाओं का साक्षी है।
२. तीनों का विश्लेषण:
- जाग्रत: बहिर्मुखी चेतना, जहाँ इन्द्रियाँ और विषय सक्रिय हैं।
- स्वप्न: अन्तर्मुखी चेतना, जहाँ मन पूर्व संस्कारों से अपनी सृष्टि रचता है।
- सुषुप्ति: अविद्या का आवरण, जहाँ मन लीन होता है और प्रज्ञानघन की स्थिति होती है (गाढ़ी निद्रा)।
- तुरीय: जब साधक समझता है कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों का अनुभव करने वाला 'मैं' शुद्ध आत्म-स्वरूप हूँ।
३. अनुभव की विधि:
साधना में जब प्रणव (ॐ) के तीन मात्रायें—अ-कार (जाग्रत), उ-कार (स्वप्न), म-कार (सुषुप्ति) का लय 'अमात्र' (शांत ओंकार ध्वनि के उपरांत की नीरवता) में होता है, तब बुद्धि तुरीय भाव में प्रतिष्ठित होती है। यह कोई शून्य नहीं, बल्कि पूर्ण बोध की स्थिति है।
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