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Raghavendra Kulkarni
Raghavendra Kulkarni 290

Asked Aug 25, 2026 at 01:12 PM • Bhagavad Gita

गीता में 'निष्काम कर्म' का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या बिना किसी परिणाम की अपेक्षा के कर्म करना व्यावहारिक है?

नमस्ते विद्वतजनों,

जब हम भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का श्लोक पढ़ते हैं: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

तो अक्सर मन में यह संशय उठता है कि आधुनिक जीवन या कार्यक्षेत्र (corporate/business) में बिना किसी लक्ष्य (Target/Goal) या फल की योजना बनाए कोई कार्य कैसे संभव है? यदि परिणाम की चिंता ही न हो तो प्रेरणा (motivation) कहाँ से आएगी? क्या निष्काम कर्म का अर्थ लक्ष्यहीन होना है या इसका कोई गहरा मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक अर्थ है? कृपया व्यावहारिक उदाहरण सहित मार्गदर्शन करें।

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Dr. Anuradha Sharma
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Answered 2 months ago

राघवेंद्र जी, यह एक अत्यंत व्यावहारिक और प्रासंगिक प्रश्न है जो लगभग हर विचारशील जिज्ञासु के मन में आता है।

१. निष्काम कर्म का अर्थ लक्ष्यहीनता नहीं है:
भगवान श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि आप लक्ष्य न बनाएं। 'निष्काम' का अर्थ 'उद्देश्यहीन' (Aimless) होना नहीं, बल्कि फल में मानसिक आसक्ति और चिंता से मुक्ति (Detachment from the anxiety of outcome) है। जब आप योजना बनाते हैं, तब आप कर्म की तैयारी कर रहे होते हैं। परंतु जब आप कर्म कर रहे होते हैं, तब आपका 100% ध्यान केवल वर्तमान क्रिया (Action in the present moment) पर होना चाहिए, न कि परिणाम के भय या दिवास्वप्न पर।

२. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण (The Flow State):
यदि कोई शल्य चिकित्सक (Surgeon) ऑपरेशन करते समय केवल यह सोचता रहे कि "अगर यह मरीज ठीक नहीं हुआ तो मेरी बदनामी होगी", तो उसके हाथ कांपने लगेंगे। लेकिन जब वह परिणाम की चिंता त्यागकर पूरी एकाग्रता से सर्जरी करता है, तभी वह सर्वश्रेष्ठ परिणाम दे पाता है। इसी को आधुनिक मनोविज्ञान में 'Flow State' कहते हैं और गीता में योगः कर्मसु कौशलम् (कर्म में कुशलता ही योग है)।

३. फल हमारे नियंत्रण में नहीं, कर्म है:
परिणाम अनेक बाह्य परिस्थितियों, समय और प्रारब्ध पर निर्भर करता है, जिस पर हमारा पूर्ण नियंत्रण नहीं होता। जब हम केवल उस पर ध्यान लगाते हैं जो हमारे हाथ में है (हमारा पुरुषार्थ), तब निराशा, अवसाद (Depression) और मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

संक्षेप में: लक्ष्य निर्धारित करके कर्म में पूर्णतः लीन हो जाना और परिणाम को ईश्वर-प्रसाद मानकर स्वीकार करना ही निष्काम कर्मयोग है।

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Pt. Shailesh Upadhyay
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Answered 1 month ago

शांकरभाष्य में भगवान शंकराचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि 'कर्मणि एव अधिकारः ते, न फलेषु कदाचन'। जब जीवात्मा फल की इच्छा से बंध जाती है, तो चित्त में वासना और विक्षेप उत्पन्न होता है। निष्काम भाव चित्त-शुद्धि का सर्वश्रेष्ठ साधन है। चित्त शुद्ध होने पर ही आत्म-ज्ञान संभव होता है।

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ऋग्वेद मण्डल 9, सूक्त 66, मन्त्र 17

य उ॒ग्रेभ्य॑श्चि॒दोजी॑या॒ञ्छूरे॑भ्यश्चि॒च्छूर॑तरः । भू॒रि॒दाभ्य॑श्चि॒न्मंही॑यान् ॥ (१७)

सोम उग्रों में अतिशय उग्र, शूरों में अतिशय शूर एवं अधिक दान करने वालों में महान्‌ हैं. (१७)

ऋग्वेद मण्डल 2, सूक्त 3, मन्त्र 5

वि श्र॑यन्तामुर्वि॒या हू॒यमा॑ना॒ द्वारो॑ दे॒वीः सु॑प्राय॒णा नमो॑भिः । व्यच॑स्वती॒र्वि प्र॑थन्तामजु॒र्या वर्णं॑ पुना॒ना य॒शसं॑ सु॒वीर॑म् ॥ (५)

हे प्रकाशित-द्वार रूप, विस्तृत मनुष्यों द्वारा नमस्कारयुक्त स्तुतियों से हवन किए जाते हुए तथा लोगों द्वारा सरलता से प्राप्त करने योग्य अग्नि! तुम खुल जाओ. तुम व्यापक, अविनाशी तथा यजमान के लिए शोभन पुत्र वाला रूप धारण करते हुए विशेष रूप से प्रसिद्ध बनो. (५)

ऋग्वेद मण्डल 8, सूक्त 16, मन्त्र 10

प्र॒णे॒तारं॒ वस्यो॒ अच्छा॒ कर्ता॑रं॒ ज्योतिः॑ स॒मत्सु॑ । सा॒स॒ह्वांसं॑ यु॒धामित्रा॑न् ॥ (१०)

इंद्र अभिमुख होकर प्रशंसनीय धन देने वाले, युद्धों में जयरूपी प्रकाश करने वाले एवं युद्ध के द्वारा शत्रुओं को हराने वाले हैं. (१०)

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केनोपनिषद् खण्ड/अध्याय 2, मन्त्र 4

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४॥

प्रतिबोध अर्थात् बार बार जानने और मनन करने से वह ब्रह्म जाना जाता है और ऐसा मनुष्य अमृत अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। मनुष्य अपनी आत्मा से बल प्राप्त करता है और ब्रह्मविद्या से ब्रह्म को प्राप्त करता है। ॥४॥

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केनोपनिषद् खण्ड/अध्याय 4, मन्त्र 5

अथाध्यात्मं यद्धेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पः ॥५॥

अध्यात्म पक्ष यह है कि यह मन जो चलता हुआ सा कहा जाता है, वही ब्रह्म है। इसलिए मन से बार बार लगातार उसी ब्रह्म का स्मरण करना चाहिए और उसी का सङ्कल्प करना चाहिए। ॥५॥

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 13, श्लोक 7

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ||१३-७||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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