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Root scriptural evidence and verses from the Vedas

ऋग्वेद मण्डल 9, सूक्त 113, मन्त्र 7

यत्र॒ ज्योति॒रज॑स्रं॒ यस्मि॑ँल्लो॒के स्व॑र्हि॒तम् । तस्मि॒न्मां धे॑हि पवमाना॒मृते॑ लो॒के अक्षि॑त॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥ (७)

हे सोम! जिस लोक में नित्य ज्योति है, स्वर्ग छिपा हुआ है, उसी अमर एवं क्षयरहित लोक में मुझे ले चलो. तुम इंद्र के लिए रस बरसाओ. (७)

ऋग्वेद मण्डल 8, सूक्त 1, मन्त्र 26

पिबा॒ त्व१॒॑स्य गि॑र्वणः सु॒तस्य॑ पूर्व॒पा इ॑व । परि॑ष्कृतस्य र॒सिन॑ इ॒यमा॑सु॒तिश्चारु॒र्मदा॑य पत्यते ॥ (२६)

हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय इंद्र! तुम सर्वप्रथम सोमरस पीने वाले की तरह निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. यह शुद्ध, रसीला, नशीला एवं सुंदर सोमरस नशा उत्पन्न करने के लिए ही बनाया गया है. (२६)

ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 5, मन्त्र 3

ऋ॒ता॒यिनी॑ मा॒यिनी॒ सं द॑धाते मि॒त्वा शिशुं॑ जज्ञतुर्व॒र्धय॑न्ती । विश्व॑स्य॒ नाभिं॒ चर॑तो ध्रु॒वस्य॑ क॒वेश्चि॒त्तन्तुं॒ मन॑सा वि॒यन्तः॑ ॥ (३)

सत्य एवं यज्ञकर्म से युक्त द्यावा-पृथिवी अग्नि को धारण करते हैं एवं समय की सीमा में घिरे शिशुरूप अग्नि को माता-पिता के समान बढ़ाते हैं. मनुष्य सभी स्थावर और जंगम प्राणियों की नाभि के समान प्रधान तथा मेधावी वैश्वानर नामक अग्नि का मन में ध्यान करते हुए सुखी होते हैं. (३)

Related Upanishads

कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 1, मन्त्र 12

स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥

हे मृत्युदेव ! स्वर्गलोकमें कुछ भी भय नहीं है। वहाँ आपका भी वश नहीं चलता। वहाँ कोई वृद्धावस्थासे भी नहीं डरता। स्वर्गलोकमें पुरुष भूख-प्यास-दोनोंको पार करके शोकसे ऊपर उठकर आनन्द मानता है ॥ १२ ॥

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केनोपनिषद् खण्ड/अध्याय 2, मन्त्र 2

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २॥

आचार्य के कथन को सुन कर शिष्य ने कहा: हे आचार्य ! मैं यह नहीं मानता कि मैं ब्रह्म के स्वरूप को भली प्रकार जानता हूँ और न मैं यह मानता हूँ कि नहीं जानता, किन्तु जानता हूँ। हम में से जो भी उस को जानता है वह यही समझता है कि मैं उसको यद्यपि नहीं जानता तथापि जानता हूँ । ॥२॥

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 40

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः | धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ||१-४०||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 34

यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन | प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ||१८-३४||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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Asked Nov 01, 2026
Topic Vedas
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