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कठोपनिषद् • वल्ली 1

Katha Upanishad (Kathopanishad) (119 Mantras)

कठोपनिषद् • वल्ली 1

Katha Upanishad (Kathopanishad) • Valli 1

29 Mantras
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 1

वाजश्रवसका दान

ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस॥ १॥

हि हिन्दी अनुवाद

प्रसिद्ध है कि यज्ञफलके इच्छुक वाजश्रवाके पुत्रने [विश्वजित् यज्ञमें] अपना सारा धन दे दिया। उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्ध पुत्र था॥ १॥

【शाङ्करभाष्यम्】 तत्राख्यायिका विद्यास्तुत्यर्था। उशन्कामयमानः, ह वा इति वृत्तार्थस्मरणार्थौ निपातौ। वाजमन्नं तद्दानानिमित्तं श्रवो यशो यस्य स वाजश्रवा रूढितो वा। तस्यापत्यं वाजश्रवसः किल विश्वजिता सर्वमेधेनेजे तत्फलं कामयमानः। स तस्मिन्क्रतौ सर्ववेदसं सर्वस्वं धनं ददौ दत्तवान्। तस्य यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किलास बभूव॥ १॥ 【भाष्यार्थ】 यहाँ जो आख्यायिका है वह विद्याकी स्तुतिके लिये है। उशन् अर्थात् कामनावाला। 'ह' और 'वै' ये निपात पहले बीते हुए वृत्तान्तको स्मरण करानेके लिये हैं। 'वाज' अन्नको कहते हैं; उसके दानादिके कारण जिसका श्रव यानी यश हो उसे वाजश्रवा कहते हैं; अथवा रूढिसे भी यह उसका नाम हो सकता है। उस वाजश्रवाके पुत्र वाजश्रवसने, जिसमें सर्वस्व समर्पण किया जाता है उस विश्वजित् यज्ञद्वारा, उसके फलकी इच्छासे यजन किया। उस यज्ञमें उसने सर्ववेदस् यानी अपना सारा धन दे डाला। कहते हैं, उस यजमानका नचिकेता नामक एक पुत्र था॥ १॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 2

तँ ह कुमारँ सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

जिस समय दक्षिणाएँ (दक्षिणास्वरूप गौएँ) ले जायी जा रही थीं, उसमें—यद्यपि अभी वह कुमार ही था—श्रद्धा (आस्तिक्यबुद्धि)का आवेश हुआ। वह सोचने लगा ॥ २ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 तं ह नचिकेतसं कुमारं प्रथमवयसं सन्तमप्राप्तजननशक्तिं बालमेव श्रद्धास्तिक्यबुद्धिः पितुर्हितकामप्रयुक्ताविवेश प्रविष्टवती। कस्मिन्काल इत्याह—ऋत्विग्भ्यः सदस्येभ्यश्च दक्षिणासु नीयमानासु विभागेनोपनीयमानासु दक्षिणार्थासु गोषु स आविष्टश्रद्धो नचिकेता अमन्यत ॥ २ ॥ 【भाष्यार्थ】 जो कुमार अर्थात् प्रथम अवस्थामें ही स्थित है और जिसे पुत्रोत्पादनकी शक्ति प्राप्त नहीं हुई उस बालक नचिकेतामें श्रद्धाका अर्थात् पिताकी हितकामनासे प्रयुक्त आस्तिक्य बुद्धिका आवेश—प्रवेश हुआ। किस समय प्रवेश हुआ ? इसपर कहते हैं—जिस समय ऋत्विक् और सदस्योंके लिये दक्षिणाएँ लायी जा रही थीं अर्थात् दक्षिणाके लिये विभाग करके गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय नचिकेताने श्रद्धाविष्ट होकर विचार किया ॥ २ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 कथमित्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 किस प्रकार विचार किया सो बतलाते हैं—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 3

नचिकेताकी शङ्का

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥ ३ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

जो जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो चुका है, जिनका दूध भी दुह लिया गया है और जिनमें प्रजननशक्तिका भी अभाव हो गया है उन गौओंका दान करनेसे वह दाता, जो अनन्द (आनन्दशून्य) लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 दक्षिणार्था गावो विशेष्यन्ते पीतमुदकं याभिस्ताः पीतोदकाः, जग्धं भक्षितं तृणं याभिस्ता जग्धतृणाः, दुग्धो दोहः क्षीराख्यो यासां ता दुग्धदोहाः, निरिन्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा निष्फला गाव इत्यर्थः । यास्ता एवंभूता गा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणाबुद्ध्या ददत्प्रयच्छन्ननन्दा अनानन्दा असुखा नामेत्येते ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ॥ ३ ॥ 【भाष्यार्थ】 दक्षिणाके लिये लायी हुई गौओंका विशेषण बतलाते हैं; जिन्होंने जल पी लिया है वे पीतोदका कहलाती हैं, जो तृण (घास) खा चुकी हैं [अर्थात् जिनमें और घास खानेकी शक्ति नहीं रही है] वे जग्धतृणा हैं, जिनका क्षीर नामक दोह दुहा जा चुका है वे दुग्धदोहा हैं तथा निरिन्द्रिया—जो सन्तान उत्पन्न करनेमें असमर्था अर्थात् बूढ़ी और निष्फल गौएँ हैं उन इस प्रकारकी गौओंको दक्षिणा-बुद्धिसे देनेवाला यजमान जो अनन्द अर्थात् सुखहीन लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 4

पिता-पुत्र-संवाद

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं तंहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

तब वह अपने पितासे बोला—'हे तात ! आप मुझे किसको देंगे ?' इसी प्रकार उसने दोबारा-तिबारा भी कहा । तब पिताने उससे 'मैं तुझे मृत्युको दूँगा' ऐसा कहा ॥ ४ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 तदेवं क्रत्वसम्पत्तिनिमित्तं पितुरनिष्टं फलं मया पुत्रेण सता निवारणीयमात्मप्रदानेनापि क्रतुसम्पत्तिं कृत्वेत्येवं मत्वा पितरम् उपगम्य स होवाच पितरं हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय दक्षिणार्थं मां दास्यसि प्रयच्छसि 【भाष्यार्थ】 तब, इस प्रकार यज्ञकी पूर्णता न होनेके कारण पिताको प्राप्त होनेवाला अनिष्ट फल मुझ-जैसे सत्पुत्रको आत्म-बलिदान करके भी निवृत्त करना चाहिये—ऐसा मानकर वह पिताके समीप जाकर बोला—'हे तात ! आप मुझे किस ऋत्विग्विशेषको दक्षिणामें देंगे ?' इस 【शाङ्करभाष्यम्】 इत्येतत्। एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्य- माणोऽपि द्वितीयं तृतीय- मप्युवाच कस्मै मां दास्यसि कस्मै मां दास्यसीति। नायं कुमारस्वभाव इति क्रुद्धः सन्पिता तं ह पुत्रं किलोवाच मृत्यवे वैवस्वताय त्वा त्वां ददामीति ॥ ४ ॥ 【भाष्यार्थ】 प्रकार कहनेपर पिताद्वारा बारम्बार उपेक्षा किये जानेपर भी उसने दूसरे-तीसरे बार भी यही बात कही कि 'मुझे किसको देंगे? मुझे किसको देंगे?' तब पिता यह सोचकर कि यह बालकोंके- से स्वभाववाला नहीं है, क्रोधित हो गया और उस पुत्रसे बोला— 'मैं तुझे सूर्यके पुत्र मृत्युको देता हूँ' ॥ ४ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 स एवमुक्तः पुत्र एकान्ते परिदेवयाञ्चकार। कथम् ? इत्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र एकान्तमें अनुताप करने लगा, किस प्रकार? सो बतलाते हैं—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 5

बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

मैं बहुत-से [शिष्य या पुत्रों]-में तो प्रथम (मुख्य वृत्तिसे) चलता हूँ और बहुतोंमें मध्यम (मध्यम वृत्तिसे) जाता हूँ। यमका ऐसा क्या कार्य है जिसे पिता आज मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे ॥ ५ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 बहूनां शिष्याणां पुत्राणां वैमि गच्छामि प्रथमः सन्मुख्या शिष्यादिवृत्त्येत्यर्थः । मध्यमानां च बहूनां मध्यमो मध्यमयैव वृत्त्यैमि। नाधमया कदाचिदपि। तमेवं विशिष्टगुणमपि पुत्रं मां मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान् पिता। स किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं प्रयोजनं 【भाष्यार्थ】 मैं बहुत-से शिष्य अथवा पुत्रोंमें तो प्रथम अर्थात् आगे रहकर मुख्य शिष्यादि वृत्तिसे चलता हूँ तथा बहुत- से मध्यम शिष्यादिमें मध्यम रहकर मध्यम-वृत्तिसे बर्तता हूँ। अधम वृत्तिसे मैं कभी नहीं रहता। उस ऐसे विशिष्ट- गुणसम्पन्न पुत्रको भी पिताने 'मैं तुझे मृत्युको देता हूँ' ऐसा कहा। परन्तु यमका ऐसा कौन-सा कर्तव्य—प्रयोजन इन्हें पूर्ण करना है जिसे ये इस प्रकार दिये हुए मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे? अवश्य 【शाङ्करभाष्यम्】 मया प्रत्तेन करिष्यति यत्कर्तव्यमद्य ? नूनं प्रयोजनम् अनपेक्ष्यैव क्रोधवशादुक्तवान् पिता। तथापि तत्पितुर्वचो मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवनापूर्वकमाह पितरं शोकाविष्टं किं मयोक्तमिति ॥ ५ ॥ 【भाष्यार्थ】 किसी प्रयोजनकी अपेक्षा न करके ही पिताने क्रोधवश ऐसा कहा है। तथापि ‘पिताका वचन मिथ्या न हो’ ऐसा विचारकर उसने अपने पितासे, जो यह सोचकर कि ‘मैंने क्या कह डाला ?’ शोकातुर हो रहे थे, खेदपूर्वक कहा ॥ ५ ॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 6

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

जिस प्रकार पूर्वपुरुष व्यवहार करते थे उसका विचार कीजिये तथा जैसे वर्तमानकालीन अन्य लोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये। मनुष्य खेतीकी तरह पकता (वृद्ध होकर मर जाता) है और खेतीकी भाँति फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 अनुपश्यालोचय निभालय सन्मार्गः सदैव अनुक्रमेण यथा सेवनीयः येन प्रकारेण वृत्ताः पूर्वे अतिक्रान्ताः पितृपितामहादयस्तव। तान्दृष्ट्वा च तेषां वृत्तमास्थातुमर्हसि। वर्तमानाश्चापरे साधवो यथा वर्तन्ते तांश्च प्रतिपश्यालोचय तथा न च तेषु मृषाकरणं वृत्तं वर्तमानं वास्ति। तद्विपरीतमसतां च वृत्तं मृषाकरणम्। न च मृषा 【भाष्यार्थ】 आपके पिता-पितामह आदि पुरुष अनुक्रमसे जिस प्रकार आचरण करते आये हैं उसकी आलोचना कीजिये—उसपर दृष्टि डालिये। उन्हें देखकर आपको उन्हींके आचरणोंका पालन करना चाहिये। तथा वर्तमानकालीन जो दूसरे साधुलोग आचरण करते हैं उनकी भी आलोचना कीजिये। उनमेंसे किसीका भी आचरण अपने कथनको मिथ्या करना नहीं था और न इस समय ही किसीका है। इसके विपरीत असत्पुरुषोंका आचरण मिथ्या करना ही है। किन्तु अपने आचरणको मृषा करके कोई अजर-अमर नहीं 【शाङ्करभाष्यम्】 कृत्वा कश्चिदजरामरो भवति। यतः सस्यमिव मर्त्यो मनुष्यः पच्यते जीर्णो म्रियते। मृत्वा च सस्यमिव आजायत आविर्भवति पुनरेवमनित्ये जीवलोके किं मृषाकरणेन। पालय आत्मनः सत्यम्। प्रेषय मां यमाय इत्यभिप्रायः॥ ६॥ 【भाष्यार्थ】 हो सकता। क्योंकि मनुष्य खेतीकी तरह पकता अर्थात् जीर्ण होकर मर जाता है, तथा मरकर खेतीके समान पुनः उत्पन्न—आविर्भूत हो जाता है। इस प्रकार इस अनित्य जीवलोकमें असत्य आचरणसे लाभ ही क्या है? अतः अपने सत्यका पालन कीजिये अर्थात् मुझे यमराजके पास भेजिये॥ ६॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 स एवमुक्तः पितात्मनः सत्यतायै प्रेषयामास। स च यमभवनं गत्वा तिस्रो रात्रीः उवास यमे प्रोषिते। प्रोष्यागतं यमममात्या भार्या वा ऊचु- र्बोधयन्तः— 【भाष्यार्थ】 पुत्रके इस प्रकार कहनेपर पिताने अपनी सत्यताकी रक्षाके लिये उसे यमराजके पास भेज दिया। वह यमराजके घर पहुँचकर तीन रात्रि टिका रहा, क्योंकि यम उस समय बाहर गये हुए थे। प्रवाससे लौटनेपर यमराजसे उनकी भार्या अथवा मन्त्रियोंने समझाते हुए कहा—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 7

यमलोकमें नचिकेता

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम्॥७॥

हि हिन्दी अनुवाद

ब्राह्मण-अतिथि होकर अग्नि ही घरोंमें प्रवेश करता है। [साधु पुरुष] उस अतिथिकी यह [अर्घ्य-पाद्य-दानरूपा] शान्ति किया करते हैं। अतः हे वैवस्वत! [इस ब्राह्मण-अतिथिकी शान्तिके लिये] जल ले जाइये॥ ७॥

【शाङ्करभाष्यम्】 वैश्वानरोऽग्निरेव साक्षात् प्रविशत्यतिथिः सन्ब्राह्मणो गृहान्दहन्निव तस्य दाहं शमयन्त इवाग्नेरेतां पाद्यासनादिदानलक्षणां 【भाष्यार्थ】 ब्राह्मण-अतिथिके रूपमें साक्षात् वैश्वानर—अग्नि ही दग्ध करता हुआ-सा घरोंमें प्रवेश करता है। उस अग्निके दाहको मानो शान्त करते हुए 【शाङ्करभाष्यम्】 शान्तिं कुर्वन्ति सन्तोऽतिथेर्यतोऽतो हराहर हे वैवस्वत उदकं नचिकेतसे पाद्यार्थम् । अतश्चाकरणे प्रत्यवायः श्रूयते ॥ ७ ॥ 【भाष्यार्थ】 ही साधु-गृहस्थजन यह पाद्यादि दानरूप शान्ति किया करते हैं। अतः हे वैवस्वत ! नचिकेताको पाद्य देनेके लिये जल ले जाइये। क्योंकि ऐसा न करनेमें प्रत्यवाय सुना जाता है ॥ ७ ॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 8

आशाप्रतीक्षे संगतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् । एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

जिसके घरमें ब्राह्मण-अतिथि बिना भोजन किये रहता है उस मन्दबुद्धि पुरुषकी ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंकी प्राप्तिकी इच्छाएँ, उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, प्रिय वाणीसे होनेवाले फल, यागादि इष्ट एवं उद्यानादि पूर्त कर्मोंके फल तथा समस्त पुत्र और पशु आदिको वह नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 आशाप्रतीक्षे अनिज्ञाताप्राप्त्यर्थ- अतिथ्युपेक्षणे प्रार्थना आशा दोषाः निज्ञाताप्राप्त्यर्थ- प्रतीक्षणं प्रतीक्षा ते आशाप्रतीक्षे, संगतं तत्संयोगजं फलम्, सूनृतां च सूनृता हि प्रिया वाक्तन्निमित्तं च, इष्टापूर्ते इष्टं यागजं पूर्तमारामादिक्रियाजं फलम्, पुत्र- पशूंश्च पुत्रांश्च पशूंश्च सर्वानितत्सर्वं यथोक्तं वृङ्क्ते आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्—पुरुषस्याल्पमेधसो- ऽल्पप्रज्ञस्य—यस्यानश्नन्नभुञ्जानो ब्राह्मणो गृहे वसति । तस्मा- दनुपेक्षणीयः सर्वावस्था- स्वप्यतिथिरित्यर्थः ॥ ८ ॥ 【भाष्यार्थ】 जिसके घरमें ब्राह्मण बिना भोजन किये रहता है उस मन्दमति पुरुषके ‘आशा-प्रतीक्षा’—आशा—जिनका कोई ज्ञान नहीं है उन प्राप्य इष्ट पदार्थोंकी इच्छा तथा अपने प्राप्य ज्ञात पदार्थोंकी प्रतीक्षा एवं संगत—उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, सूनृता—प्रिय वाणी और उससे होनेवाले फल, ‘इष्टापूर्त’— इष्ट—यागादिसे प्राप्त होनेवाले फल और पूर्त—बाग-बगीचोंके लगानेसे होनेवाले फल तथा पुत्र और पशु—इन उपर्युक्त सभीको नष्ट कर देता है। अतः तात्पर्य यह है कि अतिथि सभी अवस्थाओंमें अनुपेक्षणीय है ॥ ८ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एवमुक्तो मृत्युरुवाच नचिकेतासमुपगम्य पूजा-पुरःसरम्— 【भाष्यार्थ】 [मन्त्रियोंद्वारा] इस प्रकार कहे जानेपर यमराजने नचिकेताके पास जा उसकी पूजा करनेके अनन्तर कहा—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 9

यमराजका वरप्रदान

तिस्रो रात्रीर्यदवासीद्गृहे मे अनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः। नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

हे ब्रह्मन्! तुम्हें नमस्कार हो; मेरा कल्याण हो। तुम नमस्कारयोग्य अतिथि होकर भी मेरे घरमें तीन रात्रितक बिना भोजन किये रहे; अतः एक-एक रात्रिके लिये एक-एक करके मुझसे तीन वर माँग लो ॥ ९ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 तिस्रो रात्रीर्यस्मादवासीत्ः, उषितवानसि गृहे मे ममानश्नन् हे ब्रह्मन्नतिथिः सन्नमस्यो नमस्कारार्हश्च तस्मान्ममस्ते तुभ्यमस्तु भवतु। हे ब्रह्मन्स्वस्ति भद्रं मेऽस्तु तस्माद्भवतोऽनशनेन मद्गृहवास-निमित्ताद्दोषात्तत्प्राप्त्युपशमेन। यद्यपि भवदनुग्रहेण सर्वं मम स्वस्ति स्यात्तथापि त्वदधिक-संप्रसादार्थमनशनेनोषिताम् एकैकां रात्रिं प्रति त्रीन्वरान् वृणीष्व अभिप्रेतार्थविशेषान् प्रार्थयस्व मत्तः ॥ ९ ॥ 【भाष्यार्थ】 हे ब्रह्मन्! क्योंकि अतिथि और नमस्कारयोग्य होकर भी तुम तीन रात्रितक बिना कुछ भोजन किये मेरे घरमें रहे हो, अतः तुम्हें नमस्कार है। हे ब्रह्मन्! मेरे घरमें बिना भोजन किये आपके निवास करनेके निमित्तसे हुए दोषसे, उससे प्राप्त हुए अनिष्ट फलकी शान्तिद्वारा, मेरा मङ्गल—शुभ हो। यद्यपि आपकी कृपासे ही मेरा सब प्रकार कल्याण हो जायगा, तथापि अपनी अधिक प्रसन्नताके लिये तुम बिना भोजन किये बितायी हुई एक-एक रात्रिके प्रति मुझसे तीन वर—अपने अभीष्ट पदार्थविशेष माँग लो ॥ ९ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 नचिकेतास्त्वाह— 【शाङ्करभाष्यम्】 यदि दित्सु- वरान्— 【भाष्यार्थ】 नचिकेताने कहा—यदि आप वर देना चाहते हैं तो—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 10

प्रथम वर—पितृपरितोष

शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्या- द्‌वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो। त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे॥ १०॥

हि हिन्दी अनुवाद

हे मृत्यो! जिससे मेरे पिता वाजश्रवस मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प, प्रसन्नचित्त और क्रोधरहित हो जायँ तथा आपके भेजनेपर मुझे पहचानकर बातचीत करें—यह मैं [आपके दिये हुए] तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता हूँ॥ १०॥

【शाङ्करभाष्यम्】 शान्तसंकल्प उपशान्तः संकल्पो यस्य मां प्रति यमं प्राप्य किं नु करिष्यति मम पुत्र इति स शान्तसंकल्पः सुमनाः प्रसन्न- मनाश्च यथा स्याद्वीतमन्युर्विगत- रोषश्च गौतमो मम पिता माभि मां प्रति हे मृत्यो किं च त्वत्प्रसृष्टं त्वया विनिर्मुक्तं प्रेषितं गृहं प्रति मामभिवदेत्प्रतीतो लब्धस्मृतिः स एवायं पुत्रो ममागत इत्येवं प्रत्यभिजा- नीयादित्यर्थः। एतत्प्रयोजनं त्रयाणां प्रथममाद्यं वरं वृणे प्रार्थये यत्पितुः परितोषणम्॥ १०॥ 【भाष्यार्थ】 जिस प्रकार मेरे पिता गौतम मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प—जिनका ऐसा सङ्कल्प शान्त हो गया है कि 'न जाने मेरा पुत्र यमराजके पास जाकर क्या करेगा', सुमनाः—प्रसन्नचित्त और वीतमन्यु—क्रोधरहित हो जायँ और हे मृत्यो! आपके भेजे हुए—घरकी ओर जानेके लिये छोड़े हुए मुझसे विश्वस्त—लब्धस्मृति होकर अर्थात् ऐसा स्मरण करके कि यह मेरा वही पुत्र मेरे पास लौट आया है, सम्भाषण करें। यह अपने पिताकी प्रसन्नतारूप प्रयोजन ही मैं अपने तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता हूँ॥ १०॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 मृत्युरुवाच— 【भाष्यार्थ】 मृत्युने कहा—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 11

यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुखँरात्रीः शयिता वीतमन्यु- स्त्वा ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

मुझसे प्रेरित होकर अरुणपुत्र उद्दालक तुझे पूर्ववत् पहचान लेगा । और शेष रात्रियोंमें सुखपूर्वक सोवेगा, क्योंकि तुझे मृत्युके मुखसे छूटकर आया हुआ देखेगा ॥ ११ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 यथा बुद्धिस्त्वयि पुरस्तात् पूर्वमासीत्स्नेहसमन्विता पितुस्तव भविता प्रीतिसमन्वितस्तव पिता तथैव प्रतीतवान्सन्नौद्दालकिः उद्दालक एवौद्दालकिः। अरुणस्यापत्यमारुणिः, द्व्यामुष्यायणो वा । मत्प्रसृष्टो मयानुज्ञातः सन् इतरा अपि रात्रीः सुखं प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ता वीतमन्युर्विगतमन्युश्च भविता स्यात्त्वा पुत्रं ददृशिवान्दृष्टवान्स मृत्युमुखान्मृत्युगोचरात् प्रमुक्तं सन्तम् ॥ ११ ॥ 【भाष्यार्थ】 तेरे पिताकी बुद्धि जिस प्रकार पहले तेरे प्रति स्नेहयुक्त थी उसी प्रकार वह औद्दालकि अब भी प्रीतियुक्त होकर तेरे प्रति विश्वस्त हो जायगा। यहाँ उद्दालकको ही 'औद्दालकि' कहा है तथा अरुणका पुत्र होनेसे वह आरुणि है। अथवा यह भी हो सकता है कि वह द्व्यामुष्यायण* हो। मत्प्रसृष्टः अर्थात् मुझसे आज्ञप्त होकर वह शेष रात्रियोंमें भी सुखपूर्वक यानी प्रसन्न चित्तसे शयन करेगा तथा [यह सोचकर] वीतमन्यु—क्रोधहीन हो जायगा कि तुझ पुत्रको मृत्युके मुखसे अर्थात् मृत्युके अधिकारसे मुक्त हुआ देखा है ॥ ११ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 नचिकेता उवाच— 【भाष्यार्थ】 नचिकेता बोला— 【भाष्यार्थ】 * जो एक ही पुत्र दो पिताओंद्वारा संकेत करके अपना उत्तराधिकारी निश्चित किया जाता है वह 'द्व्यामुष्यायण' कहलाता है। वह अकेला ही दोनों पिताओंकी सम्पत्तिका स्वामी और उन्हें पिण्डदान करनेका अधिकारी होता है। जैसे पुत्ररूपसे स्वीकार किया हुआ पुत्रीका पुत्र अथवा अन्य दत्तक पुत्र आदि। अतः अकेले वाजश्रवसको ही औद्दालकि और आरुणि कहनेसे यह सम्भव है कि वह उद्दालक और अरुण दो पिताओंका उत्तराधिकारी हो।
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 12

स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन

स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

हे मृत्युदेव ! स्वर्गलोकमें कुछ भी भय नहीं है। वहाँ आपका भी वश नहीं चलता। वहाँ कोई वृद्धावस्थासे भी नहीं डरता। स्वर्गलोकमें पुरुष भूख-प्यास-दोनोंको पार करके शोकसे ऊपर उठकर आनन्द मानता है ॥ १२ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 स्वर्गे लोके रोगादिनिमित्तं भयं किंचन किंचिदपि नास्ति। न च तत्र त्वं मृत्यो सहसा प्रभावस्यतो जरया युक्त इह लोकवत्त्वत्तो न बिभेति कुतश्चित् तत्र। किंचोभे अशनायापिपासे तीर्त्वातिक्रम्य शोकमतीत्य गच्छतीति शोकातिगः सन् मानसेन दुःखेन वर्जितो मोदते हृष्यति स्वर्गलोके दिव्ये ॥ १२ ॥ 【भाष्यार्थ】 स्वर्गलोकमें रोगादिके कारण होनेवाला भय तनिक भी नहीं है। हे मृत्यो ! वहाँ आपकी भी सहसा दाल नहीं गलती। अतः इस लोकके समान वहाँ वृद्धावस्थासे युक्त होकर कोई पुरुष आपसे कहीं नहीं डरता। बल्कि पुरुष भूख-प्यास दोनोंको पार करके, जो शोकको अतिक्रमण कर जाय ऐसा शोकातीत होकर—मानसिक दुःखसे छुटकारा पाकर उस दिव्य स्वर्गलोकमें आनन्द मानता है ॥ १२ ॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 13

द्वितीय वर—स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या

स त्वमग्निःस्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

हे मृत्यो ! आप स्वर्गके साधनभूत अग्निको जानते हैं, सो मुझ

【भाष्यार्थ】 श्रद्धालुके प्रति उसका वर्णन कीजिये, [जिसके द्वारा] स्वर्गको प्राप्त हुए पुरुष अमृतत्व प्राप्त करते हैं। दूसरे वरसे मैं यही माँगता हूँ॥ १३॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एवंगुणविशिष्टस्य स्वर्गलोकस्य प्राप्तिसाधनभूतमग्निं स त्वं मृत्योत्थेषि स्मरसि जानासि इत्यर्थः, हे मृत्यो यतस्त्वं प्रब्रूहि कथय श्रद्दधानाय श्रद्धावते मह्यं स्वर्गार्थिने; येनाग्निना चितेन स्वर्गलोकाः स्वर्गो लोको येषां ते स्वर्गलोका यजमाना अमृतत्वम् अमरतां देवत्वं भजन्ते प्राप्नुवन्ति तदेतमग्निविज्ञानं द्वितीयेन वरेण वृणे ॥ १३॥ 【भाष्यार्थ】 हे मृत्यो! क्योंकि आप ऐसे गुणवाले स्वर्गलोककी प्राप्तिके साधनभूत अग्निको स्मरण रखते यानी जानते हैं, अतः मुझ स्वर्गार्थी श्रद्धालुके प्रति उसका वर्णन कीजिये; जिस अग्निका चयन करनेसे स्वर्गप्राप्त पुरुष अर्थात् स्वर्ग ही जिनका लोक है ऐसे यजमानगण अमृतत्व—अमरता अर्थात् देवभावको प्राप्त हो जाते हैं। इस अग्निविज्ञानको मैं दूसरे वरद्वारा माँगता हूँ॥ १३॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 14

यह मृत्युकी प्रतिज्ञा है—

प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४॥

हि हिन्दी अनुवाद

हे नचिकेतः! उस स्वर्गप्रद अग्निको अच्छी तरह जाननेवाला मैं तेरे प्रति उसका उपदेश करता हूँ। तू उसे मुझसे अच्छी तरह समझ ले। इसे तू अनन्तलोककी प्राप्ति करानेवाला, उसका आधार और बुद्धिरूपी गुहामें स्थित जान ॥ १४॥

【शाङ्करभाष्यम्】 प्र ते तुभ्यं प्रब्रवीमि; यत्त्वया प्रार्थितं तदु मे मम वचसो निबोध बुध्यस्वैकाग्रमनाः सन्स्वर्ग्यं स्वर्गाय हितं स्वर्गसाधनमग्निं हे नचिकेतः। 【भाष्यार्थ】 हे नचिकेतः! जिसके लिये तुमने प्रार्थना की थी उस स्वर्ग्य—स्वर्गप्राप्तिमें हितावह अर्थात् स्वर्गके साधनरूप अग्निको तू एकाग्रचित्त होकर मेरे वचनसे अच्छी तरह समझ ले उसे सम्यक् प्रकारसे जाननेवाला—उसका 【शाङ्करभाष्यम्】 प्रजानन्विज्ञातवानहं सन्नित्यर्थः । प्रब्रवीमि तन्निबोधेति च शिष्यबुद्धिसमाधानार्थं वचनम् । अधुनाग्निं स्तौति । अनन्तलोकाप्तिं स्वर्गलोकफलप्राप्तिसाधनम् इत्येतत्, अथो अपि प्रतिष्ठाम् आश्रयं जगतो विराड्रूपेण, तमेतमग्निं मयोच्यमानं विद्धि जानीहि त्वं निहितं स्थितं गुहायां विदुषां बुद्धौ निविष्टमित्यर्थः ॥ १४॥ 【भाष्यार्थ】 विशेषज्ञ मैं तेरे प्रति उसका वर्णन करता हूँ। 'मैं कहता हूँ' 'तू उसे समझ ले' ये वाक्य शिष्यके बुद्धिको समाहित करनेके लिये हैं। अब उस अग्निकी स्तुति करते हैं। जो अनन्त लोकाप्ति अर्थात् स्वर्गलोकरूप फलकी प्राप्तिका साधन तथा विराड्रूपसे जगत्की प्रतिष्ठा—आश्रय है मेरे द्वारा कहे हुए उस इस अग्निको तू गुहामें अर्थात् बुद्धिमान् पुरुषोंकी बुद्धिमें स्थित जान ॥ १४॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 इदं श्रुतेर्वचनम् । 【भाष्यार्थ】 | यह श्रुतिका वचन है—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 15

लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त- मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

तब यमराजने लोकोंके आदिकारणभूत उस अग्निका तथा उसके चयन करनेमें जैसी और जितनी ईंटें होती हैं, एवं जिस प्रकार उसका चयन किया जाता है उन सबका नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया। और उस नचिकेताने भी जैसा उससे कहा गया था वह सब सुना दिया। इससे प्रसन्न होकर मृत्यु फिर बोला ॥ १५॥

【शाङ्करभाष्यम्】 लोकादिं लोकानामादिं प्रथमशरीरित्वादग्निं तं प्रकृतं नचिकेतसा प्रार्थितमुवाचोक्तवान् मृत्युस्तस्मै नचिकेतसे । किं च या इष्टकाश्चेतव्याः स्वरूपेण, यावतीर्वा 【भाष्यार्थ】 नचिकेताने जिसके लिये प्रार्थना की थी और जिसका प्रकरण चल रहा है प्रथम शरीरी होनेके कारण लोकोंके आदिभूत उस अग्निका यमने नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया। तथा स्वरूपतः 【शाङ्करभाष्यम्】 संख्याया, यथा वा चीयतेऽग्निर्येन प्रकारेण सर्वमेतद् उक्तवानित्यर्थः। स चापि नचिकेता- स्तन्मृत्युनोक्तं यथावत्प्रत्ययेनावद- त्प्रत्युच्चारितवान्। अथ तस्य प्रत्युच्चारणेन तुष्टः सन्मृत्युः पुनरेवाह वरत्रयव्यतिरेकेणान्यं वरं दित्सुः॥ १५॥ 【भाष्यार्थ】 जिस प्रकारकी और संख्यामें जितनी ईंटोंका चयन करना चाहिये एवं यथा यानी जिस तरह अग्निका चयन किया जाता है वह सब भी कह दिया। तथा उस नचिकेताने भी, जिस प्रकार उसे मृत्युने बताया था वह सब समझकर ज्यों-का-त्यों सुना दिया। तब उसके प्रत्युच्चारणसे प्रसन्न हो मृत्युने इन तीन वरके अतिरिक्त और भी वर देनेकी इच्छासे उससे फिर कहा॥ १५॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 कथम्— | कैसे कहा [सो बतलाते हैं—]
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 16

तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः। तवैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण॥ १६॥

हि हिन्दी अनुवाद

महात्मा यमने प्रसन्न होकर उससे कहा—'अब मैं तुझे एक वर और भी देता हूँ। यह अग्नि तेरे ही नामसे प्रसिद्ध होगा और तू इस अनेक रूपवाली मालाको ग्रहण कर॥ १६॥

【शाङ्करभाष्यम्】 तं नचिकेतसमब्रवीत्प्रीयमाणः। शिष्ययोग्यतां पश्यन्प्रीयमाणः। प्रीतिमनुभवन्महात्माक्षुद्रबुद्धिर्वरं तव चतुर्थमिह प्रीतिनिमित्तमद्येदानीं ददामि भूयः पुनः प्रयच्छामि। तवैव नचिकेतसो नाम्नाभिधानेन प्रसिद्धो भविता मयोच्यमानोऽयमग्निः। किं च सृङ्कां शब्दवर्तीं रत्नमयीं 【भाष्यार्थ】 अपने शिष्यकी योग्यताको देखकर प्रसन्न हुए—प्रीतिका अनुभव करते हुए महात्मा—अक्षुद्रबुद्धि यमने नचिकेतासे कहा—अब मैं प्रसन्नताके कारण तुझे फिर भी यह चौथा वर और देता हूँ। मेरे द्वारा कहा हुआ यह अग्नि तुझ नचिकेताके ही नामसे प्रसिद्ध होगा तथा तू यह शब्द करनेवाली रत्नमयी, 【शाङ्करभाष्यम्】 मालामिमामनेकरूपां विचित्रां गृहाण स्वीकुरु। यद्वा सृङ्काम् अकुत्सितां गतिं कर्ममयीं गृहाण। अन्यदपि कर्मविज्ञानमनेकफलहेतुत्वात्स्वीकुर्वित्यर्थः ॥ १६ ॥ 【भाष्यार्थ】 अनेकरूपा विचित्रवर्णा माला भी ग्रहण—स्वीकार कर। अथवा सृङ्का यानी कर्ममयी अनिन्दिता गति ग्रहण कर। तात्पर्य यह है कि इसके सिवा अनेक फलका कारण होनेसे तू मुझसे कर्मविज्ञानको और भी स्वीकार कर ॥ १६ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह— 【भाष्यार्थ】 यमराज फिर भी कर्मकी स्तुति ही करते हैं—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 17

नाचिकेत अग्निचयनका फल

त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू। ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

त्रिणाचिकेत अग्निका तीन बार चयन करनेवाला मनुष्य [माता, पिता और आचार्य—इन] तीनोंसे सम्बन्धको प्राप्त होकर जन्म और मृत्युको पार कर जाता है। तथा ब्रह्मसे उत्पन्न हुए, ज्ञानवान् और स्तुतियोग्य देवको जानकर और उसे अनुभव कर इस अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

【शाङ्करभाष्यम्】 त्रिणाचिकेतस्त्रिः कृत्वाग्निश्चितो येन स त्रिणाचिकेतस्तद्विज्ञानस्तदध्ययनस्तदनुष्ठानवान्वा। त्रिभिर्मातृपित्राचार्यैरेत्य प्राप्य सन्धि सन्धानं सम्बन्धं मात्राद्यनुशासनं यथावत्प्राप्येत्येतत्। तद्धि प्रामाण्यकारणं श्रुत्यन्तराद् 【भाष्यार्थ】 जिसने तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन किया है उसे त्रिणाचिकेत कहते हैं। अथवा उसका ज्ञान अध्ययन और अनुष्ठान करनेवाला ही त्रिणाचिकेत है। वह त्रिणाचिकेत माता, पिता और आचार्य—इन तीनोंसे सन्धि—सन्धान यानी सम्बन्धको प्राप्त होकर अर्थात् यथाविधि माता आदिकी शिक्षाको 【शाङ्करभाष्यम्】 अवगम्यते यथा ''मातृमान्पितृमा- नाचार्यवान्ब्रूयात्'' (बृ० उ० ४। १। २) इत्यादेः। वेदस्मृतिशिष्टैर्वा प्रत्यक्षानु- मानागमैर्वा। तेभ्यो हि विशुद्धिः प्रत्यक्षा। त्रिकर्मकृद्यिज्याध्ययन- दानानां कर्ता तरत्यतिक्रामति जन्ममृत्यू। किं च ब्रह्मजं ब्रह्मणो हिरण्यगर्भाज्जातो ब्रह्मजः। ब्रह्मज- श्चासौ ज्ञश्चेति ब्रह्मजज्ञः सर्वज्ञो ह्यसौ। तं देवं द्योतनाज्ज्ञानादि- गुणवन्तमीड्यं स्तुत्यं विदित्वा शास्त्रतो निचाय्य दृष्ट्वा चात्मभावेनेमां स्वबुद्धिप्रत्यक्षां शान्तिम उपरतिमत्यन्त- मेत्यतिशयेनैति। वैराजं पदं ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानेन प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ 【भाष्यार्थ】 प्राप्त कर; क्योंकि एक दूसरी श्रुतिसे उनकी शिक्षा ही धर्मज्ञानकी प्रामाणिकतामें हेतु मानी गयी है; जैसा कि—''माता- पिता एवं आचार्यसे शिक्षित पुरुष कहे'' इत्यादि श्रुतिसे जाना जाता है। अथवा वेद, स्मृति और शिष्ट पुरुषोंसे या प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमसे [सम्बन्ध प्राप्त करके] यज्ञ, अध्ययन और दान—इन तीन कर्मोंको करनेवाला पुरुष जन्म और मृत्युको तर जाता है—उन्हें पार कर लेता है, क्योंकि उन (वेदादि अथवा प्रत्यक्षादि प्रमाणों)— से स्पष्ट ही शुद्धि होती देखी है। तथा 'ब्रह्मजज्ञ' ब्रह्मज—ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भसे उत्पन्न हुआ ब्रह्मज कहलाता है; इस प्रकार जो ब्रह्मज है और ज्ञ (ज्ञाता) भी है उसे ब्रह्मजज्ञ कहते हैं। वह सर्वज्ञ है। उस देवको—जो द्योतन आदिके कारण देव कहलाता है, और ज्ञानादि गुणवान् होनेसे ईड्य—स्तुतियोग्य है उसे शास्त्रसे जानकर और 'निचाय्य' अर्थात् आत्मभावसे देखकर अपनी बुद्धिसे प्रत्यक्ष होनेवाली इस आत्यन्तिक शान्ति—उपरतिको प्राप्त हो जाता है। अर्थात् ज्ञान और कर्मके समुच्चयका अनुष्ठान करनेसे वैराज पदको प्राप्त कर लेता है॥ १७॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 इदानीमग्निविज्ञानचयनफलम् उपसंहरति प्रकरणं च— 【भाष्यार्थ】 अब अग्निविज्ञान और उसके चयनके फलका तथा इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 18

त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥

हि हिन्दी अनुवाद

जो त्रिणाचिकेत विद्वान् अग्निके इस त्रयको [यानी कौन ईंटें हों, कितनी संख्यामें हों और किस प्रकार अग्निचयन किया जाय—इसको] जानकर नाचिकेत अग्निका चयन करता है वह देहपातसे पूर्व ही मृत्युके बन्धनोंको तोड़कर शोकसे पार हो स्वर्ग लोकमें आनन्दित होता है॥ १८॥

【शाङ्करभाष्यम्】 त्रिणाचिकेतस्त्रयं यथोक्तं या इष्टका यावतीर्वा यथा वेत्येतद् विदित्वावगत्य यश्चैवमात्मरूपेण अग्निं विद्वाँश्चिनुते निर्वर्तयति नाचिकेतमग्निं क्रतुं स मृत्युपाशान् अधर्मज्ञानरागद्वेषादिलक्षणान् पुरतः, अग्रतः पूर्वमेव शरीरपाताद् इत्यर्थः, प्रणोद्यापहाय शोकातिगो मानसैर्दुःखैर्वर्जित इत्येतद् मोदते स्वर्गलोके वैराजे विरादात्मस्वरूपप्रतिपत्त्या ॥ १८॥ 【भाष्यार्थ】 जो त्रिणाचिकेत अग्निके पूर्वोक्त त्रयको जानकर अर्थात् जो ईंटें होनी चाहिये, जितनी होनी चाहिये तथा जिस प्रकार अग्निचयन करना चाहिये— इन तीनों बातोंको समझकर उस अग्निको आत्मस्वरूपसे जाननेवाला जो विद्वान् अग्नि—क्रतुका चयन करता—साधन करता है वह अधर्म, अज्ञान और राग- द्वेषादिरूप मृत्युके बन्धनोंको पुरतः— अग्रतः अर्थात् देहपातसे पूर्व ही अपनोदन—त्याग करके शोकसे पार हुआ अर्थात् मानसिक दुःखोँसे मुक्त हुआ स्वर्गमें यानी वैराजलोकमें विराडात्मस्वरूपकी प्राप्ति होनेसे आनन्दित होता है ॥ १८ ॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 19

एष तेऽग्निनचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

हे नचिकेत् ! तूने द्वितीय वरसे जिसे वरण किया था वह यह स्वर्गका साधनभूत अग्नि तुझे बतला दिया। लोग इस अग्निको तेरा ही कहेंगे। हे नचिकेतः ! तू तीसरा वर और माँग ले ॥ १९ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 एष ते तुभ्यमग्निवरो हे नचिकेतः स्वर्ग्यः स्वर्गसाधनो यमग्निं वरमवृणीथाः प्रार्थितवानसि द्वितीयेन वरेण सोऽग्निवरो दत्त इत्युक्तोपसंहारः। किञ्च तमग्निं तवैव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति जनासो जना इत्येतत्। एष वरो दत्तो मया चतुर्थस्तुष्टेन। तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व। तस्मिन्न्द्यदत्त ऋणवानहमित्यभिप्रायः॥ १९॥ 【भाष्यार्थ】 हे नचिकेतः ! अपने दूसरे वरसे तूने जिस अग्निका वरण किया था—जिसके लिये तूने प्रार्थना की थी वह स्वर्गप्राप्तिका साधनभूत यह अग्निविज्ञान-रूप वर मैंने तुझे दे दिया। इस प्रकार उपर्युक्त अग्निविज्ञानका उपसंहार कहा गया। यही नहीं, लोग इस अग्निको तेरे ही नामसे पुकारेंगे। यह तुझसे प्रसन्न हुए मैंने तुझे चौथा वर दिया था। हे नचिकेतः ! अब तू तीसरा वर और माँग ले, क्योंकि उसे बिना दिये मैं ऋणी ही हूँ—ऐसा इसका अभिप्राय है॥ १९॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एतावद्ध्यतिक्रान्तेन विधि-प्रतिषेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणेनावगन्तव्यं यद्वरद्वयसूचितं वस्तु। न आत्मतत्त्वविषययाथात्म्यविज्ञानम्। अतो विधिप्रतिषेधार्थविषयस्यात्मनि 【भाष्यार्थ】 विधि-प्रतिषेध ही जिसके प्रयोजन हैं ऐसे उपर्युक्त मन्त्रब्राह्मणद्वारा इन दो वरोंसे सूचित इतनी ही वस्तु ज्ञातव्य है। आत्मतत्त्वविषयक यथार्थ ज्ञान इसका विषय नहीं है। अब, जो विधि-प्रतिषेधका विषय है, आत्मामें 【शाङ्करभाष्यम्】 क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणस्य स्वाभाविकस्याज्ञानस्य संसारबीजस्य निवृत्त्यर्थं तद्विपरीतब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणशून्यम् आत्यन्तिकनिःश्रेयसप्रयोजनं वक्तव्यमिति उत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते। तमेतमर्थं द्वितीयवरप्राप्याप्यकृतार्थत्वं तृतीयवरगोचरमात्मज्ञानमन्तरेण इत्याख्यायिकया प्रपञ्चयति — यतः पूर्वस्मात्कर्मगोचरात्साध्यसाधनलक्षणादनित्याद्विरक्तस्य आत्मज्ञानेऽधिकार इति तन्निन्दार्थं पुत्राद्युपन्यासेन प्रलोभनं क्रियते। 【भाष्यार्थ】 क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप करना ही जिसका लक्षण है तथा जो संसारका बीजस्वरूप है उस स्वाभाविक अज्ञानकी निवृत्तिके लिये उससे विपरीत ब्रह्मात्मैक्य विज्ञान कहना है, जो कि क्रिया, कारक और फलके अध्यारोपरूप लक्षणसे शून्य और आत्यन्तिक निःश्रेयसरूप प्रयोजनवाला है; इसीके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। इसी बातको आख्यायिकाद्वारा विस्तृत करते हैं कि तीसरे वरसे प्राप्त होनेवाले आत्मज्ञानके बिना द्वितीय वरकी प्राप्तिसे भी अकृतार्थता ही है। क्योंकि आत्मज्ञानमें उसी पुरुषका अधिकार है जो पूर्वोक्त कर्मविषयक साध्य-साधनलक्षण एवं अनित्य फलोंसे विरक्त हो गया हो। इसलिये उनकी निन्दाके लिये पुत्रादिके उपन्याससे नचिकेताको प्रलोभित किया जाता है। 【शाङ्करभाष्यम्】 नचिकेता उवाच तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्वेत्युक्तः सन्— 【भाष्यार्थ】 'हे नचिकेतः ! तुम तीसरा वर माँग लो' इस प्रकार कहे जानेपर नचिकेता बोला—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 20

तृतीय वर—आत्मरहस्य

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये— ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वरणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥

हि हिन्दी अनुवाद

मरे हुए मनुष्यके विषयमें जो यह सन्देह है कि कोई तो कहते

【भाष्यार्थ】 हैं 'रहता है' और कोई कहते हैं 'नहीं रहता' आपसे शिक्षित हुआ मैं इसे जान सकूँ। मेरे वरोंमें यह तीसरा वर है ॥ २० ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 येयं विचिकित्सा संशयः प्रेते मृते मनुष्येऽस्तीत्येकेऽस्ति शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिव्यतिरिक्तो देहान्तरसम्बन्ध्यात्मेत्येके नायमस्तीति चैके नायमेवंविधोऽस्तीति चैकेऽतश्चास्माकं न प्रत्यक्षेण नापि वानुमानेन निर्णयविज्ञानमेतद्विज्ञानाधीनो हि परः पुरुषार्थ इत्यत एतद्विद्यां विजानीयामहमनुशिष्टो ज्ञापितस्त्वया। वराणाम् एष वरस्तृतीयोऽवशिष्टः ॥ २० ॥ 【भाष्यार्थ】 मरे हुए मनुष्यके विषयमें जो इस प्रकारका सन्देह है कि कोई लोग तो ऐसा कहते हैं कि शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे अतिरिक्त देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा रहता है और किन्हींका कथन है कि ऐसा कोई आत्मा नहीं रहता; अतः इसके विषयमें हमें प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे कोई निश्चित ज्ञान नहीं होता और परम पुरुषार्थ इस विज्ञानके ही अधीन है। इसलिये आपसे शिक्षित अर्थात् विज्ञापित होकर मैं इसे भली प्रकार जान सकूँ। यही मेरे वरोंमेंसे बचा हुआ तीसरा वर है ॥ २० ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 किमयमेकान्ततो निःश्रेयससाधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्परीक्षणार्थमाह— 【भाष्यार्थ】 यह (नचिकेता) निःश्रेयसके साधन आत्मज्ञानके योग्य पूर्णतया है या नहीं—इस बातकी परीक्षा करनेके लिये यमराजने कहा—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 21

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्मः। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

पूर्वकालमें इस विषयमें देवताओंको भी सन्देह हुआ था, क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म सुगमतासे जाननेयोग्य नहीं है। हे नचिकेतः ! तू दूसरा वर माँग ले, मुझे न रोक। तू मेरे लिये यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 देवैरप्यत्रैतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्वं न हि सुज्ञेयं सुष्ठु ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतैर्जनैरतोऽणुः सूक्ष्म एष आत्माख्यो धर्मोऽतोऽन्यमसंदिग्धफलं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मां मोपरोत्सीरुपरोधं मा कार्षीमधमर्णमिवोत्तमर्णः। अतिसृज विमुञ्च एनं वरं मा मां प्रति॥ २१॥ 【भाष्यार्थ】 इस आत्मतत्त्वके विषयमें पहले—पूर्वकालमें देवताओंने भी विचिकित्सा—संशय किया था। साधारण पुरुषोंके लिये यह तत्त्व सुने जानेपर भी सुज्ञेय—अच्छी तरह जानने योग्य नहीं है, क्योंकि यह 'आत्मा' नामवाला धर्म बड़ा ही अणु—सूक्ष्म है। अतः हे नचिकेतः! कोई दूसरा निश्चित फल देनेवाला वर माँग ले। जैसे धनी ऋणीको दबाता है उसी प्रकार तू मुझे न रोक। इस वरको तू मेरे लिये छोड़ दे॥ २१॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 22

नचिकेताकी स्थिरता

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥ २२॥

हि हिन्दी अनुवाद

[नचिकेता बोला—] हे मृत्यो! इस विषयमें निश्चय ही देवताओंको भी सन्देह हुआ था तथा इसे आप भी सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते। [इसीसे वह मुझे और भी अधिक अभीष्ट है] तथा इस धर्मका वक्ता भी आपके समान अन्य कोई नहीं मिल सकता और न इसके समान कोई दूसरा वर ही है ॥ २२॥

【शाङ्करभाष्यम्】 देवैरत्राप्येतस्मिन्वस्तुनि . विचिकित्सितं किलेति भवत एव नः श्रुतम्। त्वं च मृत्यो यद्यस्मान् सुज्ञेयमात्मतत्त्वमात्थ कथयसि अतः पण्डितैरप्यवेदनीयत्वाद्वक्ता 【भाष्यार्थ】 यह बात हमने अभी आपहीसे सुनी है कि इस विषयमें देवताओंने भी सन्देह किया था। और हे मृत्यो! आप भी इस आत्मतत्त्वको सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते। अतः 【शाङ्करभाष्यम्】 चास्य धर्मस्य त्वादृक्वक्तृतुल्योऽन्यः पण्डितश्च न लभ्योऽन्विष्यमाणोऽपि। अयं तु वरो निःश्रेयसप्राप्तिहेतुः। अतो नान्यो वरस्तुल्यः सदृशोऽस्त्येतस्य कश्चिदप्यनित्यफलत्वादन्यस्य सर्वस्यैवेत्यभिप्रायः ॥ २२ ॥ 【भाष्यार्थ】 पण्डितोंसे अज्ञातव्य होनेके कारण इस धर्मका कथन करनेवाला आपके समान कोई और पण्डित ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल सकता। और यह वर भी निःश्रेयसकी प्राप्तिका कारण है। अतः इसके समान और कोई भी वर नहीं है, क्योंकि और सभी वर अनित्य फलयुक्त हैं—यह इसका अभिप्राय है ॥ २२ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभयन्नुवाच मृत्युः — 【भाष्यार्थ】 नचिकेताके इस प्रकार कहनेपर भी मृत्यु उसे प्रलोभित करता हुआ फिर बोला—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 23

यमराजका प्रलोभन

शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् । भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

हे नचिकेत ! तू सौ वर्षकी आयुवाले बेटे-पोते, बहुत-से पशु, हाथी, सुवर्ण और घोड़े माँग ले, विशाल भूमण्डल भी माँग ले तथा स्वयं भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवित रह ॥ २३ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 शतायुषः शतं वर्षाण्यायूंषि एषां ताञ्छतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व । किं च गवादिलक्षणान् बहून्पशून् हस्तिहिरण्यं हस्ती च हिरण्यं च हस्तिहिरण्यम् अश्वांश्च किं च भूमेः पृथिव्या महद्विस्तीर्णमायतनमाश्रयं मण्डलं राज्यं वृणीष्व । किं च सर्वमप्येतद् अनर्थकं स्वयं 【भाष्यार्थ】 जिनकी सौ वर्षकी आयु हो ऐसे शतायु पुत्र और पौत्र माँग ले। तथा गौ. आदि बहुत-से पशु, हाथी और सुवर्ण तथा घोड़े और पृथिवीका महान् विस्तृत आयतन—आश्रय—मण्डल अर्थात् राज्य माँग ले। परन्तु यदि स्वयं अल्पायु हो तो ये सब व्यर्थ ही हैं—इसलिये 【शाङ्करभाष्यम्】 चेदल्पायुरित्यत आह—स्वयं च जीव त्वं जीव धारय शरीरं समग्रेन्द्रियकलापं शरदो वर्षाणि यावदिच्छसि जीवितुम्॥ २३॥ 【भाष्यार्थ】 कहते हैं—तू स्वयं भी जितना जीना चाहे उतने वर्ष जीवित रह; अर्थात् शरीर यानी समग्र इन्द्रियकलापको धारण कर॥ २३॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 24

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

इसीके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका माँग ले। हे नचिकेताः! इस विस्तृत भूमिमें तू वृद्धिको प्राप्त हो। मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ॥ २४॥

【शाङ्करभाष्यम्】 एतत्तुल्यमेतेन यथोपदिष्टेन सदृशमन्यमपि यदि मन्यसे वरं तमपि वृणीष्व। किं च वित्तं प्रभूतं हिरण्यरत्नादि चिरजीविकां च सह वित्तेन वृणीष्वेत्येतत्। किं बहुना महत्यां भूमौ राजा नचिकेतस्त्वमेधि भव। किं चान्यत्कामानां दिव्यानां मानुषाणां च त्वा त्वां कामभाजं कामभागिनं कामार्हं करोमि सत्यसंकल्पो ह्यहं देवः॥ २४॥ 【भाष्यार्थ】 इस उपर्युक्त वरके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे भी माँग ले। यही नहीं, धन अर्थात् प्रचुर सुवर्ण और रत्न आदि तथा उस धनके साथ चिरस्थायिनी जीविका भी माँग ले। अधिक क्या, हे नचिकेतः! इस विस्तृत भूमिमें तू राजा होकर वृद्धिको प्राप्त हो। और तो क्या, मैं तुझे दैवी और मानुषी सभी कामनाओंका कामभागी अर्थात् इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ, क्योंकि मैं सत्य-संकल्प देवता हूँ॥ २४॥
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 25

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वांन्कामांश्च्छन्दतः प्रार्थयस्व। इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः। आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥ २५॥

हि हिन्दी अनुवाद

मनुष्यलोकमें जो-जो भोग दुर्लभ हैं उन सब भोगोंको तू स्वच्छन्दतापूर्वक माँग ले। यहाँ रथ और बाजोंके सहित ये रमणियाँ हैं। ऐसी स्त्रियाँ मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं होतीं। मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियोंसे तू अपनी सेवा करा। परन्तु हे नचिकेतः ! तू मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ ॥ २५ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 ये ये कामाः प्रार्थनीया दुर्लभाश्च मर्त्यलोके सर्वांस्तान् कामांश्छन्दतः इच्छातः प्रार्थयस्व। किं चेमा दिव्या अप्सरसो रमयन्ति पुरुषानिति रामाः सह रथैर्वर्तन्त इति सरथाः सतूर्याः सवादिस्त्रास्ताश्च न हि लम्भनीयाः प्रापणीया ईदृशा एवंविधा मनुष्यैर्मर्त्यैरस्मदादिप्रसादमन्तरेण। आभिर्मत्प्रत्ताभिर्मया दत्ताभिः परिचारिणीभिः परिचारयस्व आत्मानं पादप्रक्षालनादिशुश्रूषां कारयात्मन इत्यर्थः। नचिकेतो मरणं मरणसंबद्धं प्रश्नं प्रेतेऽस्ति नास्तीति काकदन्तपरीक्षारूपं मानुप्राक्षीर्मैवं प्रष्टुमर्हसि ॥ २५ ॥ 【भाष्यार्थ】 इस मर्त्यलोकमें जो-जो कामनाएँ—प्रार्थनीय वस्तुएँ दुर्लभ हैं उन सबको छन्दतः—इच्छानुसार माँग ले। इसके सिवा ये रामा—जो पुरुषोंके साथ रमण करती हैं उन्हें 'रामा' कहते हैं, ऐसी ये दिव्य अप्सराएँ सरथा—रथोंके सहित और सतूर्या—तूरियों (बाजों) के सहित मौजूद हैं। हम-जैसे देवताओंकी कृपाके बिना ये अर्थात् ऐसी स्त्रियाँ मरणधर्मा मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं हैं। मेरे द्वारा दी हुई इन परिचारिकाओंसे तू अपनी परिचर्या अर्थात् पादप्रक्षालनादि सेवा करा; किन्तु हे नचिकेतः ! मरण अर्थात् मरनेके पश्चात् जीव रहता है या नहीं—ऐसा कौएके दाँतोंकी परीक्षाके समान मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ, तुझे ऐसा प्रश्न करना उचित नहीं है॥ २५॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एवं प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता महाह्रदवदक्षोभ्य आह— 【भाष्यार्थ】 इस प्रकार प्रलोभित किये जानेपर भी नचिकेताने महान् सरोवरके समान अक्षुब्ध रहकर कहा—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 26

नचिकेताकी निरीहता

श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैत- त्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥

हि हिन्दी अनुवाद

हे यमराज ! ये भोग 'कल रहेंगे या नहीं'—इस प्रकारके हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके तेजको जीर्ण कर देते हैं। यह सारा जीवन भी बहुत थोड़ा ही है। आपके वाहन और नाच-गान आपके ही पास रहें [हमें उनकी आवश्यकता नहीं है] ॥ २६ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 श्वो भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति सन्दिह्यमान एव येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्तानां भोगानां ते श्वोभावाः। किं च मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो यदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तज्जरयन्ति अपक्षयन्त्यप्सरःप्रभृतयो भोगा अनर्थायैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयशः-प्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । यां चापि दीर्घजीविकां त्वं दित्ससि तत्रापि शृणु। सर्वं यद्ब्रह्माणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदादि- 【भाष्यार्थ】 आपने जिन भोगोंका उल्लेख किया है वे तो श्वोभाव हैं—जिनका भाव अर्थात् अस्तित्व 'कल रहेंगे या नहीं' इस प्रकार सन्देहयुक्त हो उन्हें श्वोभाव कहते हैं। बल्कि हे अन्तक—हे मृत्यो ! ये अप्सरा आदि भोग तो मनुष्यका जो यह सम्पूर्ण इन्द्रियोंका तेज है उसे जीर्ण—क्षीण ही कर देते हैं, अतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज और यश आदिका क्षय करनेवाले होनेसे ये अनर्थके ही कारण हैं। और आप जो दीर्घजीवन देना चाहते हैं उसके विषयमें भी सुनिये। ब्रह्माका जो सम्पूर्ण जीवन—आयु है वह भी अल्प ही है, 【शाङ्करभाष्यम्】 दीर्घजीविका। अतस्त्वैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयस्तथा नृत्यगीते च ॥ २६ ॥ 【भाष्यार्थ】 फिर हम-जैसोंके दीर्घजीवनकी तो बात ही क्या है? अतः आपके रथादि वाहन और नाच-गान आपके ही रहें ॥ २६ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 किं च— 【भाष्यार्थ】 इसके सिवा—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 27

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लभ्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥

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मनुष्यको धनसे तृप्त नहीं किया जा सकता। अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे। जबतक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे; किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः। न हि लोके वित्त-लाभः कस्यचित्तृप्तिकरो दृष्टः, यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लभ्यामहे प्राप्स्यामह इत्येतद्वित्तमद्राक्ष्म दृष्टवन्तो वयं चेत्त्वा त्वाम्। जीवितमपि तथैव । जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे त्वम् ईशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः कथं हि मर्त्यस्त्वया समेत्याल्पधनायुर्भवेत्। वरस्तु मे वरणीयः स एव यदात्म-विज्ञानम् ॥ २७ ॥ 【भाष्यार्थ】 मनुष्यको अधिक धनसे भी तृप्त नहीं किया जा सकता है। लोकमें धनकी प्राप्ति किसीको भी तृप्त करनेवाली नहीं देखी गयी। अब, जब कि हम आपको देख चुके हैं तो, यदि हमें धनकी लालसा होगी तो, उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे। इसी प्रकार दीर्घजीवन भी पा लेंगे। जबतक आप याम्यपदपर शासन करेंगे तबतक हम भी जीवित रहेंगे। भला कोई भी मनुष्य आपके सम्पर्कमें आकर अल्पायु या अल्पधन कैसे रह सकता है? किन्तु वर तो वह जो आत्मविज्ञान है वही हमारा वरणीय है ॥ २७ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यतश्च— | क्योंकि—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 28

अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन्। अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदा- नतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥

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कभी जराग्रस्त न होनेवाले अमरोंके समीप पहुँचकर नीचे पृथ्वीपर रहनेवाला कौन जराग्रस्त विवेकी मनुष्य होगा जो केवल शारीरिक वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले [स्त्रीसम्भोग आदि] सुखोंको [अस्थिररूपमें] देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवनमें सुख मानेगा ? ॥ २८ ॥

【शाङ्करभाष्यम्】 अजीर्यतां वयोहानिमप्राप्नुवताममृतानां सकाशमुपेत्य उपगम्यात्मन उत्कृष्टं प्रयोजनान्तरं प्राप्तव्यं तेभ्यः प्रजानन् उपलब्धमानः स्वयं तु जीर्यन्मर्त्यो जरामरणवान्क्वधःस्थः कुः पृथिवी अधश्चान्तरिक्षादिलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठतीति क्वधःस्थः सन् कथमेवमविवेकिभिः प्रार्थनीयं पुत्रवित्तहिरण्याद्यस्थिरं वृणीते। क्व तदास्थ इति वा पाठान्तरम्। अस्मिन्पक्षे चाक्षरयोजना। तेषु पुत्रादिष्वास्था आस्थितिस्तात्पर्येण 【भाष्यार्थ】 वयोहानिरूप जीर्णताको प्राप्त न होनेवाले अमरों—देवताओंकी सन्निधिमें पहुँचकर उनसे प्राप्त होने योग्य अपने अन्य उत्कृष्ट प्रयोजनको—प्राप्तव्यको जानता—प्राप्त करता हुआ भी जो स्वयं जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है अर्थात् जरामरणशील है ऐसा क्वधःस्थः—'कु' पृथिवीको कहते हैं, वह अन्तरिक्षादि लोकोंकी अपेक्षा अधः—नीची [होनेके कारण 'क्वधः' कहलाती] है, उसपर जो स्थित होता है वह क्वधःस्थ कहा जाता है; ऐसा होकर भी—इस प्रकार अविवेकियोंद्वारा प्रार्थनीय पुत्र, धन और सुवर्ण आदि अस्थिर पदार्थोंको कैसे माँगेगा ? कहीं 'क्वधःस्थः' के स्थानमें 'क्व तदास्थः' ऐसा भी पाठ है। इस पक्षमें अक्षरोंकी योजना इस प्रकार 【शाङ्करभाष्यम्】 वर्तनं यस्य स तदास्थः, ततोऽधिकतरं पुरुषार्थं दुष्प्रापमपि प्रापयिषुः क्व तदास्थो भवेन्न कश्चित्तदसारज्ञस्तदर्थी स्यादित्यर्थः । सर्वो ह्युपर्युपर्येव बुभूषति लोकस्तस्मान्न पुत्रवित्तादिलोभैः प्रलोभ्योऽहम् । किं चाप्सरः-प्रमुखान्वर्णरतिप्रमोदाननवस्थित-रूपतयाभिध्यायन्निरूपयन्यथावद् अतिदीर्घे जीविते को विवेकी रमेत ॥ २८ ॥ 【भाष्यार्थ】 करनी चाहिये। उन पुत्रादिमें जिसकी आस्था—आस्थिति अर्थात् तत्परतापूर्वक प्रवृत्ति है वह 'तदास्थ' है। जो उनसे भी उत्कृष्टतर और दुष्प्राप्य पुरुषार्थको पानेका इच्छुक है वह पुरुष उनमें आस्था करनेवाला कैसे होगा ? अर्थात् उन्हें असार समझनेवाला कोई भी पुरुष उनका अर्थी (इच्छुक) नहीं हो सकता, क्योंकि सभी लोग उत्तरोत्तर उन्नत ही होना चाहते हैं; अतः मैं पुत्र-धन आदि लोभोंसे प्रलोभित नहीं किया जा सकता। तथा वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले अप्सरा आदि सुखोंकी अस्थिररूपमें भावना करता हुआ; उन्हें यथावत् (मिथ्यारूपसे) समझता हुआ कौन विवेकी पुरुष अति दीर्घ जीवनमें प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 अतो विहायानित्यैः कामैः प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम्— 【भाष्यार्थ】 अतः मुझे इन मिथ्या भोगोंसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके लिये मैंने प्रार्थना की है और—
कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 29

यस्मिनिदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥

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हे मृत्यो! जिस (परलोकगत जीव)-के सम्बन्धमें लोग 'है या नहीं है' ऐसा सन्देह करते हैं तथा जो महान् परलोकके विषयमें

【भाष्यार्थ】 [निश्चित विज्ञान] है वह हमसे कहिये। यह जो गहनतामें अनुप्रविष्ट हुआ वर है इससे अन्य और कोई वर नचिकेता नहीं माँगता॥ २९॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यस्मिन्प्रेत इदं विचिकित्सनं- विचिकित्सन्ति अस्ति नास्तीत्येवंप्रकारं हे मृत्यो साम्पराये परलोकविषये महति महत्प्रयोजननिमित्ते आत्मनो निर्णयविज्ञानं यत्तद्ब्रूहि कथय नोऽस्मभ्यम्। किं बहुना योऽयं प्रकृत आत्मविषयो वरो गूढं गहनं दुर्विवेचनं प्राप्तोऽनुप्रविष्टः तस्माद्वरादन्यमविवेकिभिः प्रार्थनीय- मनित्यविषयं वरं नचिकेता न वृणीते मनसापीतिश्रुतेर्वचन- मिति॥ २९॥ 【भाष्यार्थ】 हे मृत्यो! जिस परलोकगत जीवके विषयमें ऐसा सन्देह करते हैं कि मरनेके अनन्तर 'रहता है या नहीं रहता' उस महान्-महान् प्रयोजनके निमित्तभूत साम्पराय—परलोकके सम्बन्धमें उस आत्माका जो निश्चित विज्ञान है वह हमसे कहिये। अधिक क्या, यह जो आत्मविषयक प्रकृत वर है वह बड़ा ही गूढ—गहन है और दुर्विवेचनीयताको प्राप्त हो रहा है। उस वरसे अन्य अविवेकी पुरुषोंद्वारा प्रार्थनीय कोई और अनित्य वस्तुविषयक वर नचिकेता मनसे भी नहीं माँगता— यह श्रुतिका वचन है॥ २९॥
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