कठोपनिषद् • वल्ली 1
Katha Upanishad (Kathopanishad) (119 Mantras)
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कठोपनिषद् • वल्ली 1
Katha Upanishad (Kathopanishad) • Valli 1
वाजश्रवसका दान
ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस॥ १॥
हि हिन्दी अनुवाद
प्रसिद्ध है कि यज्ञफलके इच्छुक वाजश्रवाके पुत्रने [विश्वजित् यज्ञमें] अपना सारा धन दे दिया। उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्ध पुत्र था॥ १॥
तँ ह कुमारँ सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
जिस समय दक्षिणाएँ (दक्षिणास्वरूप गौएँ) ले जायी जा रही थीं, उसमें—यद्यपि अभी वह कुमार ही था—श्रद्धा (आस्तिक्यबुद्धि)का आवेश हुआ। वह सोचने लगा ॥ २ ॥
नचिकेताकी शङ्का
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥ ३ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
जो जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो चुका है, जिनका दूध भी दुह लिया गया है और जिनमें प्रजननशक्तिका भी अभाव हो गया है उन गौओंका दान करनेसे वह दाता, जो अनन्द (आनन्दशून्य) लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥
पिता-पुत्र-संवाद
स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं तंहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
तब वह अपने पितासे बोला—'हे तात ! आप मुझे किसको देंगे ?' इसी प्रकार उसने दोबारा-तिबारा भी कहा । तब पिताने उससे 'मैं तुझे मृत्युको दूँगा' ऐसा कहा ॥ ४ ॥
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
मैं बहुत-से [शिष्य या पुत्रों]-में तो प्रथम (मुख्य वृत्तिसे) चलता हूँ और बहुतोंमें मध्यम (मध्यम वृत्तिसे) जाता हूँ। यमका ऐसा क्या कार्य है जिसे पिता आज मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे ॥ ५ ॥
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
जिस प्रकार पूर्वपुरुष व्यवहार करते थे उसका विचार कीजिये तथा जैसे वर्तमानकालीन अन्य लोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये। मनुष्य खेतीकी तरह पकता (वृद्ध होकर मर जाता) है और खेतीकी भाँति फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥
यमलोकमें नचिकेता
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम्॥७॥
हि हिन्दी अनुवाद
ब्राह्मण-अतिथि होकर अग्नि ही घरोंमें प्रवेश करता है। [साधु पुरुष] उस अतिथिकी यह [अर्घ्य-पाद्य-दानरूपा] शान्ति किया करते हैं। अतः हे वैवस्वत! [इस ब्राह्मण-अतिथिकी शान्तिके लिये] जल ले जाइये॥ ७॥
आशाप्रतीक्षे संगतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् । एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
जिसके घरमें ब्राह्मण-अतिथि बिना भोजन किये रहता है उस मन्दबुद्धि पुरुषकी ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंकी प्राप्तिकी इच्छाएँ, उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, प्रिय वाणीसे होनेवाले फल, यागादि इष्ट एवं उद्यानादि पूर्त कर्मोंके फल तथा समस्त पुत्र और पशु आदिको वह नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥
यमराजका वरप्रदान
तिस्रो रात्रीर्यदवासीद्गृहे मे अनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः। नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे ब्रह्मन्! तुम्हें नमस्कार हो; मेरा कल्याण हो। तुम नमस्कारयोग्य अतिथि होकर भी मेरे घरमें तीन रात्रितक बिना भोजन किये रहे; अतः एक-एक रात्रिके लिये एक-एक करके मुझसे तीन वर माँग लो ॥ ९ ॥
प्रथम वर—पितृपरितोष
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्या- द्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो। त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे॥ १०॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे मृत्यो! जिससे मेरे पिता वाजश्रवस मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प, प्रसन्नचित्त और क्रोधरहित हो जायँ तथा आपके भेजनेपर मुझे पहचानकर बातचीत करें—यह मैं [आपके दिये हुए] तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता हूँ॥ १०॥
यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुखँरात्रीः शयिता वीतमन्यु- स्त्वा ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
मुझसे प्रेरित होकर अरुणपुत्र उद्दालक तुझे पूर्ववत् पहचान लेगा । और शेष रात्रियोंमें सुखपूर्वक सोवेगा, क्योंकि तुझे मृत्युके मुखसे छूटकर आया हुआ देखेगा ॥ ११ ॥
स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन
स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे मृत्युदेव ! स्वर्गलोकमें कुछ भी भय नहीं है। वहाँ आपका भी वश नहीं चलता। वहाँ कोई वृद्धावस्थासे भी नहीं डरता। स्वर्गलोकमें पुरुष भूख-प्यास-दोनोंको पार करके शोकसे ऊपर उठकर आनन्द मानता है ॥ १२ ॥
द्वितीय वर—स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या
स त्वमग्निःस्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे मृत्यो ! आप स्वर्गके साधनभूत अग्निको जानते हैं, सो मुझ
यह मृत्युकी प्रतिज्ञा है—
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे नचिकेतः! उस स्वर्गप्रद अग्निको अच्छी तरह जाननेवाला मैं तेरे प्रति उसका उपदेश करता हूँ। तू उसे मुझसे अच्छी तरह समझ ले। इसे तू अनन्तलोककी प्राप्ति करानेवाला, उसका आधार और बुद्धिरूपी गुहामें स्थित जान ॥ १४॥
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त- मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
तब यमराजने लोकोंके आदिकारणभूत उस अग्निका तथा उसके चयन करनेमें जैसी और जितनी ईंटें होती हैं, एवं जिस प्रकार उसका चयन किया जाता है उन सबका नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया। और उस नचिकेताने भी जैसा उससे कहा गया था वह सब सुना दिया। इससे प्रसन्न होकर मृत्यु फिर बोला ॥ १५॥
तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः। तवैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण॥ १६॥
हि हिन्दी अनुवाद
महात्मा यमने प्रसन्न होकर उससे कहा—'अब मैं तुझे एक वर और भी देता हूँ। यह अग्नि तेरे ही नामसे प्रसिद्ध होगा और तू इस अनेक रूपवाली मालाको ग्रहण कर॥ १६॥
नाचिकेत अग्निचयनका फल
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू। ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
त्रिणाचिकेत अग्निका तीन बार चयन करनेवाला मनुष्य [माता, पिता और आचार्य—इन] तीनोंसे सम्बन्धको प्राप्त होकर जन्म और मृत्युको पार कर जाता है। तथा ब्रह्मसे उत्पन्न हुए, ज्ञानवान् और स्तुतियोग्य देवको जानकर और उसे अनुभव कर इस अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है।
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥
हि हिन्दी अनुवाद
जो त्रिणाचिकेत विद्वान् अग्निके इस त्रयको [यानी कौन ईंटें हों, कितनी संख्यामें हों और किस प्रकार अग्निचयन किया जाय—इसको] जानकर नाचिकेत अग्निका चयन करता है वह देहपातसे पूर्व ही मृत्युके बन्धनोंको तोड़कर शोकसे पार हो स्वर्ग लोकमें आनन्दित होता है॥ १८॥
एष तेऽग्निनचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे नचिकेत् ! तूने द्वितीय वरसे जिसे वरण किया था वह यह स्वर्गका साधनभूत अग्नि तुझे बतला दिया। लोग इस अग्निको तेरा ही कहेंगे। हे नचिकेतः ! तू तीसरा वर और माँग ले ॥ १९ ॥
तृतीय वर—आत्मरहस्य
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये— ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वरणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥
हि हिन्दी अनुवाद
मरे हुए मनुष्यके विषयमें जो यह सन्देह है कि कोई तो कहते
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्मः। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
पूर्वकालमें इस विषयमें देवताओंको भी सन्देह हुआ था, क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म सुगमतासे जाननेयोग्य नहीं है। हे नचिकेतः ! तू दूसरा वर माँग ले, मुझे न रोक। तू मेरे लिये यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥
नचिकेताकी स्थिरता
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥ २२॥
हि हिन्दी अनुवाद
[नचिकेता बोला—] हे मृत्यो! इस विषयमें निश्चय ही देवताओंको भी सन्देह हुआ था तथा इसे आप भी सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते। [इसीसे वह मुझे और भी अधिक अभीष्ट है] तथा इस धर्मका वक्ता भी आपके समान अन्य कोई नहीं मिल सकता और न इसके समान कोई दूसरा वर ही है ॥ २२॥
यमराजका प्रलोभन
शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् । भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे नचिकेत ! तू सौ वर्षकी आयुवाले बेटे-पोते, बहुत-से पशु, हाथी, सुवर्ण और घोड़े माँग ले, विशाल भूमण्डल भी माँग ले तथा स्वयं भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवित रह ॥ २३ ॥
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
इसीके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका माँग ले। हे नचिकेताः! इस विस्तृत भूमिमें तू वृद्धिको प्राप्त हो। मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ॥ २४॥
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वांन्कामांश्च्छन्दतः प्रार्थयस्व। इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः। आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥ २५॥
हि हिन्दी अनुवाद
मनुष्यलोकमें जो-जो भोग दुर्लभ हैं उन सब भोगोंको तू स्वच्छन्दतापूर्वक माँग ले। यहाँ रथ और बाजोंके सहित ये रमणियाँ हैं। ऐसी स्त्रियाँ मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं होतीं। मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियोंसे तू अपनी सेवा करा। परन्तु हे नचिकेतः ! तू मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ ॥ २५ ॥
नचिकेताकी निरीहता
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैत- त्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे यमराज ! ये भोग 'कल रहेंगे या नहीं'—इस प्रकारके हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके तेजको जीर्ण कर देते हैं। यह सारा जीवन भी बहुत थोड़ा ही है। आपके वाहन और नाच-गान आपके ही पास रहें [हमें उनकी आवश्यकता नहीं है] ॥ २६ ॥
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लभ्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
मनुष्यको धनसे तृप्त नहीं किया जा सकता। अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे। जबतक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे; किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥
अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन्। अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदा- नतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
कभी जराग्रस्त न होनेवाले अमरोंके समीप पहुँचकर नीचे पृथ्वीपर रहनेवाला कौन जराग्रस्त विवेकी मनुष्य होगा जो केवल शारीरिक वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले [स्त्रीसम्भोग आदि] सुखोंको [अस्थिररूपमें] देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवनमें सुख मानेगा ? ॥ २८ ॥
यस्मिनिदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥
हि हिन्दी अनुवाद
हे मृत्यो! जिस (परलोकगत जीव)-के सम्बन्धमें लोग 'है या नहीं है' ऐसा सन्देह करते हैं तथा जो महान् परलोकके विषयमें
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